शनि सताए तो क्या करें

शनि सताए तो क्या करें  

व्यूस : 7422 | जुलाई 2008
शनि सताये तो क्या करें पं. राधाकृष्ण त्रिपाठी शनि ग्रह को ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इसे दंडाधिकारी माना गया है। अगर यह जन्मकुंडली में कारक हो तो जातक को सुख एवं सफलता की बुलंदियों पर पहंुचा देता है, लेकिन अकारक अथवा अशुभ होने पर जातक को अत्यंत दुःख तथा विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। भारतीय ज्योतिष में शनि के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए अनेक उपाय बताए गए हैं। यदि जातक शनि की साढ़ेसाती व ढैया से पीड़ित हो तो निम्न उपाय करके लाभान्वित हो सकता है। स पुरुषाकार तांत्रिक शनि यंत्र का पूजन करें। स शनि की पत्नियों का स्मरण करें। शनि की पत्नियों के नाम निम्न हैं। शनि की महादशा यदि कष्टकारक हो और जातक रोगग्रस्त हो, तो भगवान शंकर के महामृत्युंजय मंत्र का जप करना या कराना लाभदायक होता है। शनि की दशा यदि मारक हो तो मृत संजीवनी मंत्र का जप वृद्ध ब्राह्मण के द्वारा करवाना चाहिए। शनि की दशा यदि बाधक तथा परिवार के लिए कष्टकारक हो तो शुक्लपक्ष का प्रदोष व्रत करना चाहिए। ऐसे में रुद्राभिषेक करवाने से भी लाभ की प्राप्ति होती है। रूद्राभिषेक प्रतिमाह संभव न हो तो पर्व तथा अपने जन्म दिवस के अवसर पर करवाना चाहिए। शनि के कारण उत्पन्न हुए रोगों से बचाव के लिए पंचाक्षर मंत्र ¬ नमः शिवाय अथवा अघोर मंत्र का जप करना चाहिए। शनि की पीड़ा से मुक्ति के लिए हनुमान जी की उपासना तथा सुंदरकांड, बजरंग बाण या हनुमत कवच का नित्य पाठ करना तथा शनिवार को हनुमान जी को चोला चढ़ाना चाहिए। शनि के मारक या मारकेश होने पर महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप तथा तेल का दान करना लाभदायक होता है। शनि वात तथा नसों का कारक है, अतः यदि यह अशुभ होकर अपनी दशा या अंतर्दशा में वात-विकार से पीड़ित करता हो तो निम्नलिखित उपाय करने चाहिए। भृंगराज, जायफल तथा कस्तूरी को धोकर उनके पंाच-पांच ग्राम चूर्ण बना लें तथा एक किलो तिल के तेल में पकाएं। पूरी तरह पक जाने पर उतार कर छान लें तथा नीले कांच की बोतल में भरकर सात दिन धूप में रखें। सात दिन प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पूर्व इस तेल से पूरे शरीर पर मालिश करें और कुछ समय बाद स्नान करें। यह सिद्ध शनि तेल वात-विकार, पक्षाघात, पैरों की दुर्बलता, नसों की कमजोरी, स्मरण-शक्ति में कमी आदि को दूर करता है तथा बालों को काला व घना करता है साथ ही यह शनि प्रदŸा अरिष्टों का शमन भी करता है। यदि शनि रोग कारक हो तथा जातक को रोगों ने घेर लिया हो, तो यह उपाय करें। निम्नलिखित शनि पीड़ा निवारक मंत्र चैकोर पत्थर पर काली स्याही अथवा कोयले से लिखें तथा रोगी के सिर से सात बार उतार कर किसी कुएं में डाल दें। ध्यान रहे कि उस कुएं के पानी का सेवन रोगी कभी भूलकर भी न करे। रोगी को नित्य कीडी नगरा के पौधे को जल से सींचना चाहिए। शनि पीड़ा निवारणार्थ अन्य उपाय- काले घोड़े की नाल अथवा नाव की पुरानी कील के पत्तर पर नीचे अंकित यंत्र बनाकर शनिवार को विधवत पूजन करने के उपरांत धारण करने से शनि पीड़ा से तत्काल मुक्ति मिलती है। स्टील के पत्तर पर निम्नलिखित यंत्र अंकित कराकर उस शनि की लोहे की प्रतिमा स्थापित करें तथा शनिवार को शुभ नक्षत्र व मुहूर्Ÿा में गंगाजल व काली गाय के कच्चे दूध से उसे स्नान कराकर पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शनि के ‘¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः मंत्र का 19 माला (चालीस दिनों तक) प्रतिदिन जप करें। अंतिम दिन हवन करें। हवन में शनि की मूर्ति आवश्यक है। इसके पश्चात इस सिद्ध शनि यंत्र के नित्य पूजन व दर्शन करें, शनि पीड़ा से मुक्ति मिलेगी। यदि वाहन दुर्घटना हो, घर का बंटवारा हो, झगड़ा हो, नेत्र विकार हो, कर्ज हो, कारोबार बंद होने की स्थिति हो तो शनिवार को शनि का पंचदशी यंत्र विधिवत् बनवाकर पूजन आदि के बाद धारण करें। शनि पीड़ा से मुक्ति के लिए शनिवार का व्रत रखें व कथा सुनें। शास्त्रों व पुराणांे में वर्णित शनि की कथाओं में शनि एवं हरिश्चंद्र, शनि एवं दशरथ, शनि एवं विक्रमादित्य, शनि एवं नल, शनि एवं पिप्पलादि मुनि, शनि एवं श्री हनुमान, शनि एवं पाण्डेय, शनि एवं शिव का युद्ध आदि प्रमुख हैं। शनि शांति हेतु कुछ अन्य उपाय दशा, अंतर्दशा, गोचर अथवा कुंडली में शनि के अकारक व बाधक होने की स्थिति में जातक को शनि कवच, शनि स्तोत्र अथवा शनि मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करना चाहिए। इसके अतिरिक्त शनि को प्रसन्न, अनुकूल एवं बली करने हेतु निम्नांकित किसी भी मंत्र का श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से जप करना चाहिए। सजीव वैदिक मंत्र- ¬ खां खीं खौं सः ¬ भूभुर्वः स्वः ¬ शन्नोदेवीरभीष्टय आपोभवन्तु पीतये। शंयोरिभिसृवन्तु नः ¬ स्वः भुवः भूः ¬ सः खौं खीं खां श्नैश्चराय नमः एकाक्षरी बीज मंत्र- ¬ शं शनैश्चराय नमः। तांत्रिक बीज मंत्र- ¬ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः। वैदिक मंत्र- ¬ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतयेशंयोरभि सृवन्तु नः। अथर्व वेदीय शनि प्रार्थना मंत्र- शं नो मित्रशं वरुणः शं बिवस्वान शमन्तकः उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षः शन्नोदिविचरा ग्रहः। उक्त मंत्रों में से किसी भी मंत्र का नियमित रूप से जप करें अथवा अनुष्ठान के रूप में 23000 की संख्या में जपकर दशांश हवन, मार्जन और तर्पण करें। फिर ब्राह्मण भोजन कराएं, आशातीत लाभ होगा। स्टील के पत्तर पर निम्नलिखित यंत्र अंकित कराकर उस शनि की लोहे की प्रतिमा स्थापित करें तथा शनिवार को शुभ नक्षत्र व मुहूर्Ÿा में गंगाजल व काली गाय के कच्चे दूध से उसे स्नान कराकर पंचोपचार पूजन करें। तत्पश्चात शनि के ‘ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः मंत्र का 19 माला (चालीस दिनों तक) प्रतिदिन जप करें। अंतिम दिन हवन करें। स्वामिनी ध्वंसिनी चैव कंकाली च महाबला कलही कंटकी चैव दुर्मुखी च अजामुखी एतत् शनिश्चरा भार्या प्रातः सायं ये पठेत् तस्य शनिश्चरः पीड़ा भवंतु कदाचन।

Ask a Question?

Some problems are too personal to share via a written consultation! No matter what kind of predicament it is that you face, the Talk to an Astrologer service at Future Point aims to get you out of all your misery at once.

SHARE YOUR PROBLEM, GET SOLUTIONS

  • Health

  • Family

  • Marriage

  • Career

  • Finance

  • Business

शनि विशेषांक  जुलाई 2008

futuresamachar-magazine

शनि का खगोलीय, ज्योतिषीय एवं पौराणिक स्वरूप, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं दशा के प्रभाव, शनि के दुष्प्रभावों से बचने एवं उनकी कृपा प्राप्ति हेतु उपाय, शनि प्रधान जातकों के गुण एवं दोष, शनि शत्रु नहीं मित्र भी, एक संदर्भ में विवेचना

सब्सक्राइब


.