ऋणानुबंधन पीड़ा निवारण

ऋणानुबंधन पीड़ा निवारण  

व्यूस : 6228 | सितम्बर 2012
ऋणानुबंधन पीड़ा निवारण ओम प्रकाश दार्शनिक प्रत्येक व्यक्ति पर जन्म के साथ ही तीन ऋण अर्थात देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण तो अनिवार्य रूप से बाध्यकारी हो जाते हैं। परंतु ये बाध्यकारी क्यों होते हैं और ज्योतिष में इन्हें किन योगों से जाना जा सकता है। और इस दोष के निवारण के लिए ऐसे क्या सामान्य उपाय किये जा सकतें है पढ़े इस लेख में। जन्म के साथ ही बाध्यकारी होने जाने वाले ऋणों से यदि प्रयास पूर्वक मुक्ति प्राप्त न की जाये तो जीवन की प्राप्तियों का अर्थ अधूरा रह जाता है। इन दोषों स े पीडित़ कडंु ली शापित कुडं ली कही जाती है। ऐसे व्यक्ति अपने मातृ-पक्ष अर्थात माता के अतिरिक्त मामा-मामी, मौसा- मौसी, नाना-नानी, तथा पितृ पक्ष अर्थात दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई आदि को कष्ट व दुख देता है और उनकी अवहेलना व तिरस्कार करता है। जन्मकुंडली में यदि चंद्र पर राहु-केतु या शनि का प्रभाव होता है तो जातक मातृ-ऋण से पीड़ित होता है। चंद्रमा मन का प्रतिनिधि ग्रह है, अतः ऐसे जातक को निरंतर मानसिक अशांति से भी पीड़ित होना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को मातृ-ऋण से मुक्ति के पश्चात् ही जीवन में शांति मिलनी संभव होती है। पितृ ऋण के कारण व्यक्ति को मान-प्रतिष्ठा के अभाव से पीड़ित होने के साथ-साथ संतान की ओर से कष्ट, संतानाभाव, संतान का स्वास्थ्य खराब होने या संतान का सदैव बुरी संगति जैसी स्थितियों में रहना पड़ता है। यदि संतान अपंग, मानसिक रूप से विक्षिप्त या पीड़ित है तो व्यक्ति का संपूर्ण जीवन उसी पर केंद्रित हो जाता है। जन्म-पत्री में यदि सूर्य पर शनि, राहु, केतु की दृष्टि या युति द्वारा प्रभाव हो तो जातक की कुंडली में पितृ-ऋण की स्थिति मानी जाती है। माता-पिता के अतिरिक्त हमें जीवन म अनेक व्यक्तियों का सहयोग व सहायता प्राप्त होती है, गाय, बकरी आदि पशुओं से दूध मिलता है। फल-फूल व अन्य साधनों से हमारा जीवन सुखमय होता है, इन्हें बनाने व इनका जीवन चलाने में यदि हमने अपनी ओर से किसी प्रकार का सहयोग नहीं दिया तो इनका भी ऋण हमारे ऊपर हो जाता है। जन-कल्याण के कार्यों में रूचि लेकर हम इस ऋण से उऋण हो सकते हैं। देव ऋण अर्थात देवताओं के ऋण से भी हम पीड़ित होते हैं। हमारे लिए सर्वप्रथम देवता हैं हमारे माता-पिता परंतु हमारे इष्टदेव का स्थान भी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण है। व्यक्ति भव्य व शानदार बंगला बना लेता है, अपने व्यावसायिक स्थान का भी विस्तार कर लेता है, किंतु उस जगत स्वामी के स्थान के लिए सबसे अंत में सोचता है या सोचता ही नहीं है जिसकी अनुकंपा से समस्त ऐश्वर्य, वैभव व सकल पदार्थ प्राप्त होता है। उसके लिए घर में कोई स्थान नहीं होगा, तो व्यक्ति को देव-ऋण से पीड़ित होना पड़ेगा। नई पीढ़ी की विचारधारा में परिवर्तन हो जाने के कारण न तो कुल देवता पर आस्था रही है और न ही लोग भगवान को मानते हैं। फलस्वरूप ईश्वर भी अपनी अदृश्य शक्ति से उन्हें नाना प्रकार के कष्ट प्रदान करते हैं। ऋषि-ऋण के विषय में भी लिखना आवश्यक है। जिस ऋषि के गोत्र में हम जन्मे हैं, उसी का तर्पण करने से हम वंचित हो जाते हैं। हम लोग अपने गोत्र को भूल चुके हैं। अतः हमारे पूर्वजों की इतनी उपेक्षा से उनका श्राप हमें पीढ़ी-दर पीढ़ी परेशान करेगा। इसमें कतई संदेह नहीं करना चाहिए। जो लोग इन ऋणों से मुक्त होने के लिए उपाय करते हैं, वे प्रायः अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफल हो जाते हैं। उनके परिवार में ऋण नहीं है, रोग नहीं है, गृह क्लेश नहीं है, पत्नी-पति के विचारों में सामंजस्य व एकरूपता है, संताने माता-पिता का सम्मान करती हैं, परिवार के सभी लोग परस्पर मिल-जुल कर प्रेम से रहते हैं। अपने सुख-दुख बांटते हैं, अपने अनुभव एक दूसरे को बताते हैं। ऐसा परिवार ही सुखी परिवार होता है। पितृ ऋण के कारण व्यक्ति को मान-प्रतिष्ठा के अभाव से पीड़ित होने के साथ-साथ संतान की ओर से कष्ट, संतानाभाव, संतान का स्वास्थ्य खराब होने या संतान का सदैव बुरी संगति जैसी स्थितियों में रहना पड़ता है। यदि संतान अपंग, मानसिक रूप से विक्षिप्त या पीड़ित है तो व्यक्ति का संपूर्ण जीवन उसी पर केंद्रित हो जाता है। दूसरी ओर कोई-कोई परिवार तो इतना शापित होता है कि उसे मनहूस परिवार की संज्ञा दी जाती है। सारे के सारे सदस्य तीर्थ यात्रा पर जाते हैं अथवा कहीं सैर सपाटे पर भ्रमण के लिए निकल जाते हैं और गाड़ी की दुर्घटना में सभी एक साथ मृत्यु को प्राप्त करते हैं। पीछे बच जाता है, परिवार का कोई एक सदस्य, समस्त जीवन उनका शोक मनाने के लिए। इस प्रकार का पूरा का पूरा वंश ही शापित होता है। इस प्रकार के लोग कारण तलाशते हैं। जब सुखी थे, तब न जाने किस-किस का हिस्सा हड़प लिया था, किस की संपत्ति पर अधिकार जमा लिया था, किसी निर्धन-कमजोर अड़ोसी-पड़ोसी को दुख दिया था अथवा अपने वृद्ध माता-पिता की अवहेलना और दुर्दशा भी की और उसकी आत्मा से आह निकलती रही कि जा, तेरा वंश ही समाप्त हो जाए, कोई पानी देने वाला भी न रहे तेरे वंश में। अतएव अपने सुखी जीवन में भी मनुष्य को डर कर चलना चाहिए। मनुष्य को पितृ ऋण उतारने का सतत प्रयास करना चाहिए। जिस परिवार में कोई दुखी होकर आत्म-हत्या करता है या उसे आत्महत्या के लिए विवश किया जाता है, तो इस परिवार का बाद में क्या हाल होगा? इस पर विचार करें। आत्म हत्या करना सरल नहीं है, अपने जीवन को कोई यूं ही तो नहीं मिटा देता, उसकी आत्मा तो वहीं भटकेगी। वह आप को कैसे चैन से सोने देगी, थोड़ा विचार करें। किसी कन्या का अथवा स्त्री का बलात्कार किया जाए तो वह आप को श्राप क्यों न देगी, इस पर विचार करें। वह यदि आत्म-हत्या करती है, तो कसूर किसका है। उसकी आत्मा पूरे वंश को श्राप देगी। सीधी आत्मा के श्राप से बचना सहज नहीं है। आपके वंश को इसे भुगतना ही पडेगा, यही प्रेत बाधा दोष व यही पितृ दोष है। इसे समझें। पितृ दोष के ज्योतिषीय योग: Û लग्नेश की अष्टम स्थान में स्थिति अथवा अष्टमेश की लग्न में स्थिति। पंचमेश की अष्टम में स्थिति या अष्टमेश की पंचम में स्थिति। नवमेश की अष्टम में स्थिति या अष्टमेश की नवम में स्थिति। तृतीयेश, चतुर्थेश या दशमेश की उपरोक्त स्थितियां। तृतीयेश व अष्टमेश का संबंध होने पर छोटे भाई-बहनों, चतुर्थ के संबंध से माता, एकादश के संबंध से बड़े भाई, दशमेश के संबंध से पिता के कारण पितृ दोष की उत्पत्ति होती हैं। सूर्य, मंगल व शनि पांचवे भाव में स्थित हो या गुरु, राहु बारहवें भाव में स्थित हो। राहु-केतु की पंचम, नवम अथवा दशम भाव में स्थिति या इनसे संबंधित होना। राहु या केतु की सूर्य से युति या दृष्टि संबंध (पिता के परिवार की ओर से दोष)। राहु या केतु का चंद्रमा के साथ युति या दृष्टि द्वारा संबंध (माता की ओर से दोष)। चंद्र, राहु पुत्र की आयु के लिए हानिकारक। राहु या केतु की बृहस्पति के साथ युति अथवा दृष्टि संबंध (दादा अथवा गुरु की ओर से दोष)। मंगल के साथ राहु या केतु की युति या दृष्टि संबंध (भाई की ओर से दोष)। वृश्चिक लग्न या वृश्चिक राशि में जन्म भी एक कारण होता है, क्योंकि वह राशि चक्र के अष्टम स्थान से संबंधित है। शनि-राहु चतुर्थ या पंचम भाव में हो तो मातृ-दोष होता है। मंगल-राहु चतुर्थ स्थान में हो तो मामा का दोष होता है। यदि राहु-शुक्र की युति हो तो जातक ब्राह्मण का अपमान करने से पीड़ित होता है। मोटे तौर पर राहु-सूर्य पिता का दोष, राहु-चंद्र माता का दोष, राहु-बृहस्पति दादा का दोष, राहु-शनि सर्प और संतान का दोष होता है। इन दोषों के निराकरण के लिए सर्वप्रथम जन्मकुंडली का उचित तरीके से विश्लेषण करें और यह ज्ञात करने की चेष्टा करें कि यह दोष किस-किस ग्रह से बन रहा है। उसी दोष के अनुरूप उपाय करने से आपके कष्ट समाप्त हो जायेंगे। अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों के नाम पर मंदिर में दूध, चीनी, श्वेत वस्त्र व दक्षिणा आदि दें। पीपल की 108 परिक्रमा निरंतर 108 दिन तक लगायें। परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु होने पर उसके निमित्त पिंडदान अवश्य करायें। ग्रहण के समय दान अवश्य करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। जन-कल्याण के कार्य करें, वृक्षारोपण करें। जल की व्यवस्था में सहयोग दें। पितृदोष निवारण के लिए विशेष रूप से निर्मित यंत्र लगाकर एक विशेष यंत्र का 45 दिन विधिवत पाठ करके गृह शुद्धि करें। श्रीमद्भागवत का पाठ करें या श्रवण करें। इससे पितृदोष समाप्त हो जाता है, और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उनके आशीर्वाद से हमारा परिवार जो वास्तव में उनका ही एक अंश है, सुखी हो जाता है।



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