कृष्ण जन्माष्टमी (17-8-2014)

कृष्ण जन्माष्टमी (17-8-2014)  

फ्यूचर पाॅइन्ट
व्यूस : 3175 | आगस्त 2014

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म पर मनाया जाने वाला पावन पर्व जन्माष्टमी भारत भूमि पर मनाया जाने वाला ऐसा त्यौहार है जिसे अब सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में कई स्थानों पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। भगवान कृष्ण के भगवद् गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। हिन्‍दुओं का यह त्‍यौहार श्रावण मास (अमूमन जुलाई या अगस्‍त) के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी के दिन मनाया जाता है।

हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के राजा कंस का अंत करने के लिए हुआ था। कंस श्रीकृष्ण की माता देवकी का सगा भाई था। मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां निशीथे कृष्णपक्षके, शशांके वृषराशिस्थे ऋक्षे रोहिणी संज्ञके।। योगेऽस्मिन्वसुदेवाद्धि देवकी मामजीजनत् केवलोपवासेन तास्मिन्जन्मदिने मम सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः।।

भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, दिन बुधवार, रोहिणी नक्षत्र एवं वृषराशिस्थ चंद्रमा में हुआ था। अतः इस दिन जन्माष्टमी व्रत रखने का विधान है। इस व्रत को बाल, युवा, वृद्ध सभी कर सकते हैं। यह व्रत भारत वर्ष के कुछ प्रांतों में सूर्य उदय कालीन अष्टमी तिथि को तथा कुछ जगहों पर तत्काल व्यापिनी अर्थात अर्द्धरात्रि में पड़ने वाली अष्टमी तिथि को किया जाता है।

सिद्धांत रूप से यह अधिक मान्य है। कृष्ण जन्माष्टमी व्रत विधि जन्माष्टमी का व्रत सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है। उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं और उसके बाद सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें। इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें- ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये।। अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकी जी के लिए ‘सूतिका गृह’ नियत करें। इसके बाद श्रीकृष्ण की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः निर्दिष्ट करना चाहिए।

फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें- ‘प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामन।। वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।। सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।।’ अंत में जन्माष्टमी की रात को प्रसाद वितरण करना चाहिए। कहा जाता है जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है।

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शारीरिक हाव भाव एवं लक्षण विशेषांक  आगस्त 2014

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