वास्तु सम्मत अस्पताल

वास्तु सम्मत अस्पताल  

प्रमोद कुमार सिन्हा
व्यूस : 5506 | अकतूबर 2010

अस्पताल के लिए भूखंड आयताकार एवं वर्गाकार होनी चाहिए। वर्गाकार एवं आयताकार भूखंड में चुंबकीय प्रवाह का निर्माण समुचित रूप से होता है। जिस भूखंड में सकारात्मक ऊर्जा एवं विद्युत चंुबकीय लहरों का निर्माण होता है वह भूखंड शुभफलदायी होता है। आयताकार भूखंड का आकार 2ः1 अनुपात से अधिक बड़ा नहीं रखना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर भूखंड में विद्युत चंुबकीय ऊर्जा का प्रभाव क्षीण हो जाता है। अस्पताल का मुख्य भवन भूखंड के दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए। अस्पताल की बनावट इस तरह होनी चाहिए कि उसका चेहरा अर्थात आगे का हिस्सा पूर्व या उत्तर की तरफ रहे। इससे अस्पताल की प्रसिद्धि शीघ्र मिलती है। अस्पताल में मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व, ईशान या उत्तर की तरफ लाभप्रद होता है। अस्पताल में पानी के लिए बोरिंग या ट्यूबवेल की व्यवस्था भूखंड के ईशान क्षेत्र में करनी चाहिए।

साथ ही अस्पताल के उत्तर या पूर्व में फव्वारा, झरना या तालाब की व्यवस्था रखना अस्पताल के प्रगति एवं प्रसिद्धि में चार चांद लगा देता है। ऐसे अस्पताल राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाते हैं। अस्पताल के भूखंड की ढ़ाल भी उत्तर-पूर्व की तरफ लाभप्रद होती है। उत्तर-पूर्व की तरफ अधिक से अधिक खुली जगह रखनी चाहिए। अस्पताल के भवन का निर्माण दक्षिण से लेकर पश्चिम की तरफ करना लाभदायक होता है। अस्पताल का मध्य भाग खुला और साफ सुथरा रखना चाहिए। मरीजों के लिए स्वागत कक्ष उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। इसकी आंतरिक व्यवस्था को इस तरह व्यवस्थित करना चाहिए कि बैठने पर मरीजों का मुंह उत्तर या पूर्व की तरफ रहे। अस्पताल में मुख्य डाॅक्टर का परीक्षण कक्ष दक्षिण-पश्चिम में बनानी चाहिए। डाॅक्टर को कमरे के अंदर दक्षिण-पश्चिम में बैठे हुए उत्तर या पूर्व की ओर मुंह कर मरीजों को स्वास्थ्य संबंधी सलाह देना चाहिए।

डाॅक्टर पूर्व की तरफ मुख कर बैठते हों तो मरीज को उनके दायीं तरफ तथा उत्तर की तरफ मुख कर बैठते हों तो मरीज को बायीं तरफ बैठाना चाहिए। मरीज को इस तरह लेटाकर परीक्षण या जाॅच करनी चाहिए ताकि मरीज का सिर दक्षिण, पश्चिम या पूर्व की तरफ रहे। अस्पताल में शल्य कक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण कक्ष होता है। इसे पश्चिम में रखना चाहिए। शल्य कक्ष में आॅपरेशन कराते समय मरीज का सर दक्षिण की तरफ रखना लाभप्रद होता है। डाॅक्टर को आॅपरेशन करते समय चेहरा पूर्व या उत्तर की तरफ रखना चाहिए। दक्षिण की तरफ चेहरा कर आॅपरेशन नहीं करना चाहिए। आॅपरेशन कक्ष में प्रयोग होने वाले उपकरणों एवं संयंत्रो को दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना चाहिए।

मरीज का कमरा वायव्य की तरफ रखना विशेष शुभफलदायक होता है। इमरजेंसी वार्ड को भवन के वायव्य मंे रखना चाहिए। इस स्थान पर अत्यधिक बीमार मरीज को रखने से वह शीघ्र स्वस्थ हो जाता है। नर्स या कर्मचारियों के लिए क्वार्टर अस्पताल के दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पश्चिम की तरफ बनाना चाहिए। सीटी स्कैन, एक्स-रे, इ.सी.जी, अल्ट्रासाउण्ड या अन्य इलेक्ट्रीकल मशीनें भवन के दक्षिण-पूर्व के कमरे में रखनी चाहिए। अस्पताल में गहन चिकित्सा कक्ष को वायव्य के क्षेत्र में बनाया जाना चाहिए। शल्य चिकित्सा विभाग जहां आॅपरेशन किया जाता है इसके लिए सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र पश्चिम दिशा है। छोटे आॅपरेशन के लिए उत्तर एवं उत्तर-पूर्व का क्षेत्र भी बनाया जा सकता है। मनोरोग विभाग, आंखों के विभाग के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान पश्चिम का क्षेत्र है।

आंख, नाक, कान के संयुक्त विभाग उत्तर-पूर्व या पूर्व की तरफ रखे जा सकते हैं। बाह्य चिकित्सा विभाग (जहां पर मरीज आकर डाॅक्टरों से परामर्श लेते हैं) उत्तर और पूर्व की दिशा श्रेष्ठ होती है। जहां तक कार्डियोलाॅजी विभाग का सवाल है उसके लिए पूर्व की दिशा लाभप्रद होती है तथा क्षय रोग के लिए पूर्व और वायव्य की दिशा अच्छी होती है। औषधि कक्ष के लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान पूर्व और उत्तर-पूर्व की दिशा होती है। मुर्दा घर या पोस्टमार्टम कक्ष मृत्यु के देवता यम् की दिशा दक्षिण में बनाया जाना चाहिए। एक्स-रे, अल्ट्रासाउण्ड, सीटी स्कैन, रेडियोलाॅजी इत्यादि विद्युतीय उपकरणों को आग्नेय दिशा में रखना सर्वश्रेष्ठ होता है।

प्रसूति वार्ड उत्तर या पूर्व दिशा में बनाया जा सकता है। आॅपरेशन के बाद स्वास्थ्य लाभ कक्ष उत्तर या उत्तर-पूर्व क्षेत्र में बनाया जा सकता है। अस्पताल में सीढ़ियां वास्तु नियमों के अनुरूप बनानी चाहिएं। सीढियां और लिफ्ट पश्चिम, दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम हिस्से में बनाई जा सकती हैं। अस्पताल के मध्य भाग में सीढियां एवं लिफ्ट नहीं बनानी चाहिए। सीढियों का घुमाव सदैव घड़ी की दिशा में होना चाहिएं। अर्थात् चढ़ते समय सीढ़ियां हमेशा दायीं ओर मुड़नी चाहिए। सीढ़ियां हमेशा विषम संख्या में बनानी चाहिए। अस्पताल मे मरीजों के लिए बेड की व्यवस्था वास्तु के नियमों को ध्यान में रखकर करना लाभप्रद होता है। मरीज का सर उत्तर की ओर नहीं होना चाहिए, क्योंकि सर उत्तर की ओर रखने पर पृथ्वी क्षेत्र का उत्तरी ध्रुव मानव के उत्तरी ध्रुव (सिर को उत्तरी ध्रुव कहा गया है।) से घृणा कर चुंबकीय प्रभाव को अस्वीकार करेगा जिससे शरीर में रक्त संचार हेतु उचित और अनुकूल चुंबकीय क्षेत्र का लाभ नहीं मिल सकेगा।

इसके फलस्वरूप मस्तिष्क में तनाव, छाती में दर्द, जकड़न एवं अच्छी नींद नहीं आती। मरीजों को दक्षिण दिशा में सर कर सोने से शरीर को शांतिमय निद्रा एवं अनुकूल अवस्था प्राप्त होती है क्येंकि सर दक्षिण दिशा में रख कर सोने से चुंबकीय परिक्रमा पुरी होने के कारण चुंबकीय तरंगों के प्रभाव मे रूकावट नहीं होती जिससे शीघ्र स्वास्थ्य में लाभ मिलता है। इसके अलावा सर को पश्चिम और पूर्व की ओर कर सुलाना भी लाभप्रद होता है। अस्पताल में रंगों का ध्यान रखना आवश्यक है। क्योंकि रंगों का हमारे दैनिक जीवन में काफी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

अस्पताल के इमारत को शौम्य, हल्का एवं सात्विक (नीले, हरे, सफेद और हल्के रंग) रंगों का प्रयोग करना अच्छा होता है। लाल, काला और भुरा रंगों के प्रयोग से बचना चाहिए। अस्पताल के मुख्य द्वार के सामने किसी भी तरह का अवरोध या वेध नहीं होना चाहिए। गंदे नाली, एवं कुड़ा-करकट भी रहना अस्पताल के प्रसिद्धि एवं प्रगति के लिए अच्छा नहीं होता। अतः अस्पताल के मुख्य द्वार के सामने किसी भी तरह रूकावट या व्यवधान नहीं होना चाहिए। अस्पताल को साफ-सुथरा एवं धुल मिट्टी रहित रखनी चाहिए। अस्पताल में पार्किंग की व्यवस्था उत्तर-पश्चिम, उत्तर या पूर्व में करना लाभप्रद होता है। पर्यावरण को ठीक रखने के लिए अस्पताल के अंदर छोटे-छोटे पेड़-पौधे का होना आवश्यक है।

हरे भरे उद्यान और तुलसी जैसे अन्य औषधीय पेड़-पौधे को उत्तर-पूर्व क्षेत्र में लगाना अस्पताल को मनमोहक एवं प्राकृतिक वातावरण से सुशोभित करता है। किसी भी तरह का मरूस्थलीय पौधे का रोपण या पोषण अस्पताल के सीमा में नहीं करना चाहिए। साथ ही कांटेदार एवं दूध वाला पौधा भी नहीं लगाना चाहिए, ऐसा पौधा प्रतिकूलता देता है।

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परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010


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