शयन की दिशा का वैज्ञानिक आधार

शयन की दिशा का वैज्ञानिक आधार  

व्यूस : 14929 | दिसम्बर 2006
शयन की दिशा का वैज्ञानिक आधार श्याम सुंदर अरोड़ा दिन भर की थकान के बाद दो घड़ी अच्छी नींद की चाह सभी को होती है, आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय से सोना भले ही मुश्किल हो लेकिन सही दिशा का चयन कर अच्छी नींद ली जा सकती है। नींद आने में कौन से कारक प्रभावी होते हैं, जानने के लिए पढ़िए यह आलेख... निद्रा हर प्राणी और वन¬स्पति के लिए अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य अपने जीवन का एक तिहाई समय सोने में ही व्यतीत करता है। सोने का महत्व तो इसी से प्रमाणित हो जाता है कि यदि किसी दिन मनुष्य को नींद नहीं आए तो अगले दिन वह बेचैन हो जाता है। जब मनुष्य दिन भर श्रम करता है तो उसे स्वस्थ रहने के लिए विश्राम की अत्यंत आवश्यकता होती है। विश्राम के अभाव में वह रुग्ण हो जाएगा। विश्राम के लिए सोना अत्यंत आवश्यक है। विश्राम का भी एक वैज्ञानिक आधार है। विश्राम कैसे करें? शयन कक्ष कैसा हो? शयन कैसे किया जाए कि पूर्ण विश्राम मिल सके? गलत शयन से अपच, उच्च रक्तचाप, तनाव, सिरदर्द आदि का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अगर मनुष्य अपने शयन में कुछ बातों का ध्यान रखे तो इस प्रकार की कई बीमारियों से बच सकता है। शयन समय क्या हो: शयन के समय का भी एक वैज्ञानिक आधार है। देर रात को सोना सही नहीं है। शास्त्रों में बताया गया है कि सूर्य डूबने से पहले भोजन करना, 9 से 10 बजे के मध्य सोना और प्रातः 4 बजे उठना स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है। सायंकाल 6 से 7 बजे के मध्य सूर्य पूर्व दिशा से 180 अंश पर होता है। आधी रात को पूर्व दिशा से 270, रात के 2 बजे 300, प्रातः 4 बजे 330 और प्रातः 6 बजे पुनः 360 अथवा 0 अंश पर आता है। इस प्रकार सूर्य प्रातः 4 बजे तक हमारे मस्तिष्क को कम मात्रा में प्रभ¬ावित करता है। इसी कारण प्रातः 4 बजे उठने का नियम प्राचीन काल से भारतीयों में प्रचलित है। इसलिए सोने का सबसे उत्तम समय रात 9 बजे से प्रातः 4 बजे तक माना गया है। ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत, स्वास्थ्यरक्षार्थ मानुषः। तत्र दुःखस्त शान्त्यर्थ स्मरेद्धि मधुसूदनम्।। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ब्राह्म मुहूर्त में उठना उत्तम है। ब्राह्म मुहूर्त में उठकर दुख से मुक्ति के लिए भगवान का ध्यान करके अपनी दिनचर्या आरंभ करनी चाहिए। दिशा चयन: शयन की सही दिशा का निर्धारण भी आवश्यक होता है। सिर उत्तर की ओर रख कर सोने से हृदय रोग, मस्तिष्क रोग, अस्थि रोग आदि होने की संभावना रहती है। (चित्र संख्या 1 देखें) इसमें पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाया गया है। पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति का विस्तार ब्रह्मांड में पृथ्वी की सतह से 1 लाख 75 हजार किलोमीटर तक होता है। पृथ्वी की चुंबकीय धाराएं उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। मनुष्य का सिर उत्तरी तथा पैर दक्षिणी ध्रुव होता है। उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि इस अवस्था में दोनों ध्रुव एक ही दिशा में आ जाते हैं जिससे विकर्षण होता है और विपरीत चुंबकीय परिक्षेत्र बनता है। फलतः मनुष्य के मस्तिष्क और हृदय पर सारी रात एक दबाव बना रहता है। ऐसे में हृदय या मस्तिष्क रोग होने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त अस्थि दर्द, आलस, चिड़चिड़ापन, कार्य न करने की इच्छा आदि सामान्य बातें हैं। कमजोर लोगों की स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। वे बीमार और दरिद्र होते हैं। दक्षिण दिशा में सिर रख कर सोने से चुंबकीय क्षेत्र बनता है और पृथ्वी की चुंबकीय धाराएं पैर के माध्यम से दक्षिण को जाती हैं, जिससे व्यक्ति द्रा हर प्राणी और वन¬स्पति के लिए अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य अपने जीवन का एक तिहाई समय सोने में ही व्यतीत करता है। सोने का महत्व तो इसी से प्रमाणित हो जाता है कि यदि किसी दिन मनुष्य को नींद नहीं आए तो अगले दिन वह बेचैन हो जाता है। जब मनुष्य दिन भर श्रम करता है तो उसे स्वस्थ रहने के लिए विश्राम की अत्यंत आवश्यकता होती है। विश्राम के अभाव में वह रुग्ण हो जाएगा। विश्राम के लिए सोना अत्यंत आवश्यक है। विश्राम का भी एक वैज्ञानिक आधार है। विश्राम कैसे करें? शयन कक्ष कैसा हो? शयन कैसे किया जाए कि पूर्ण विश्राम मिल सके? गलत शयन से अपच, उच्च रक्तचाप, तनाव, सिरदर्द आदि का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अगर मनुष्य अपने शयन में कुछ बातों का ध्यान रखे तो इस प्रकार की कई बीमारियों से बच सकता है। शयन समय क्या हो: शयन के समय का भी एक वैज्ञानिक आधार है। देर रात को सोना सही नहीं है। शास्त्रों में बताया गया है कि सूर्य डूबने से पहले भोजन करना, 9 से 10 बजे के मध्य सोना और प्रातः 4 बजे उठना स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है। सायंकाल 6 से 7 बजे के मध्य सूर्य पूर्व दिशा से 180 अंश पर होता है। आधी रात को पूर्व दिशा से 270, रात के 2 बजे 300, प्रातः 4 बजे 330 और प्रातः 6 बजे पुनः 360 अथवा 0 अंश पर आता है। इस प्रकार सूर्य प्रातः 4 बजे तक हमारे मस्तिष्क को कम मात्रा में प्रभ¬ावित करता है। इसी कारण प्रातः 4 बजे उठने का नियम प्राचीन काल से भारतीयों में प्रचलित है। इसलिए सोने का सबसे उत्तम समय रात 9 बजे से प्रातः 4 बजे तक माना गया है। ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत, स्वास्थ्यरक्षार्थ मानुषः। तत्र दुःखस्त शान्त्यर्थ स्मरेद्धि मधुसूदनम्।। स्वस्थ रहने की दृष्टि से ब्राह्म मुहूर्त में उठना उत्तम है। ब्राह्म मुहूर्त में उठकर दुख से मुक्ति के लिए भगवान का ध्यान करके अपनी दिनचर्या आरंभ करनी चाहिए। दिशा चयन: शयन की सही दिशा का निर्धारण भी आवश्यक होता है। सिर उत्तर की ओर रख कर सोने से हृदय रोग, मस्तिष्क रोग, अस्थि रोग आदि होने की संभावना रहती है। (चित्र संख्या 1 देखें) इसमें पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को दर्शाया गया है। पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति का विस्तार ब्रह्मांड में पृथ्वी की सतह से 1 लाख 75 हजार किलोमीटर तक होता है। पृथ्वी की चुंबकीय धाराएं उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं। मनुष्य का सिर उत्तरी तथा पैर दक्षिणी ध्रुव होता है। उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर सोना इसलिए उचित नहीं है क्योंकि इस अवस्था में दोनों ध्रुव एक ही दिशा में आ जाते हैं जिससे विकर्षण होता है और विपरीत चुंबकीय परिक्षेत्र बनता है। फलतः मनुष्य के मस्तिष्क और हृदय पर सारी रात एक दबाव बना रहता है। ऐसे में हृदय या मस्तिष्क रोग होने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त अस्थि दर्द, आलस, चिड़चिड़ापन, कार्य न करने की इच्छा आदि सामान्य बातें हैं। कमजोर लोगों की स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। वे बीमार और दरिद्र होते हैं। दक्षिण दिशा में सिर रख कर सोने से चुंबकीय क्षेत्र बनता है और पृथ्वी की चुंबकीय धाराएं पैर के माध्यम से दक्षिण को जाती हैं, जिससे व्यक्ति को गहन निद्रा आती है। शयन कक्ष का चयन वास्तु शास्त्र में शयन कक्ष के निर्माण पर विशद चर्चा की गई है। शयन कक्ष यथासंभव दक्षिण अथवा पश्चिम दिशा में ही रखना चाहिए। पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाली सूर्य तथा पृथ्वी की ऊर्जाएं शयन कक्ष को ऊर्जा से भर देती हैं। शयन कक्ष के लिए निम्न बातों का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। दरवाजा एक ही हो। शुद्ध वायु प्रवाह की उचित व्यवस्था हो। जिस दिशा में सिर हो, उधर कोई विद्युत या इलेक्ट्राॅनिक उपकरण न रखें। जब मनुष्य निद्रा में होता है तब मस्तिष्क में सक्रियता होती है और उस समय कई प्रकार के रसायनों का निर्माण होता है, जो मस्तिष्क और शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक होते हैं। विद्युत और इलेक्ट्राॅनिक उपकरण इन आवश्यक रसायनों के निर्माण में बाधा पहुंचाते हैं। सिर की तरफ हवा फेंकने वाला पंखा न रखें। शयन कक्ष में तांबे के पात्र में जल हमेशा रखें। रात को विद्युत प्रकाश और पंखे के कारण वातावरण में कुछ विद्युत तरंगें बनती हैं, जो शरीर पर बहुत ही सूक्ष्म प्रभाव डालती हैं। तांबे का पात्र इन विद्युत तरंगों को ग्रहण कर लेता है। पात्र के माध्यम से ये तरंगें जल में समाहित हो जाती हैं और उसकी शक्ति बढ़ जाती है जिससे व्यक्ति को लाभ पहुंचता है। शयन कक्ष को सुसंस्कृत रखना चाहिए, इससे नींद शीघ्र आती है। अगर आप अध्ययन के शौकीन हैं तो पुस्तकें उचित स्थान पर रखें। शयन कक्ष में दुर्घटना से बचने के लिए अनावश्यक फर्नीचर न रखें। रात में शयन कक्ष में हल्का, आंखों को न चुभने वाला प्रकाश अवश्य जलाए रखें।

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