यंत्र | श्री यंत्र की साधना
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श्री यंत्र की साधना विजय कुमार शास्त्राी श्रीयंत्र शिव व शिवा का विग्रह यंत्र है। विद्या व धन की प्राप्ति के लिए श्री यंत्र की साधना की जाती है। श्री यंत्र ताम्र पत्र पर सपाट व रजत स्वर्ण आदि पर कूर्माकार या सुमेरु पर्वत के समान ऊपर से उठे हुए आकार का मिलता है। इस यंत्र में, मुख्य रूप से 18 शक्तियों का अर्चन होता है। ये शक्तियां ही संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करती हैं। साधक इन शक्तियों के अर्चन पूजन से अपने शरीर, मन, बुद्धि, चित, अहंकार व दसों इंद्रियों के साथ-साथ, समस्त ब्रह्मांड अथवा ब्रह्म जगत को अपने वश में कर लेता है। श्री यंत्र की कृपा से उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और चमत्कारी सिद्धियों, धन-धान्य व सुख की प्राप्ति होती है। श्री यंत्र के दर्शन मात्र से सब पाप, श्राप और ताप का शमन हो जाता है और धन-धान्य व स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस की साधना वाम व दक्षिण दोनों मार्गों से की जाती है। बौद्ध काल में इस वाम मार्गी साधना का दुरुपयोग किया गया। अतः आदि शंकराचार्य द्वारा परिष्कृत दक्षिण मार्गी श्री यंत्र के स्वरूप की साधना की परंपरा आज भी प्रचलित है। श्री यंत्र को दुकान में रखने से बिक्री, पूजा घर में रखने से धन धान्यादि और कारखाने या अन्य किसी व्यवसाय क्षेत्र में रखने से व्यवसाय में उन्नति व वृद्धि होती है। इसका सवेरे उठकर दर्शन मात्र करने से ही हर प्रकार का लाभ मिलने लगता है। विनियोग मंत्र अस्य श्रीं श्रीं यंत्र-मंत्रस्य हिरण्य गर्भ-ऋषि अनुष्टुप छन्द श्री महात्रिपुर संुदरी श्री महा-लक्ष्मी देवता श्री बीजम मम दुःख दारिद्र्य विनाशाय श्री सिद्धि श्री यंत्र श्री महा त्रिपुर सुंदर्ये श्री महालक्ष्म्यै मंत्र जपे विनियोगः। (साधक अपना नाम ले) ऋष्यादिन्यास- 1. हिरण्यगर्भ ऋषये नमः शिरसे। 2. अनुष्टुप ऋषये नमः शिरसे। 3. अनुष्टुप छंद से नमः मुखे। 4. श्री महात्रिपुर सुंदर्ये श्री महालक्ष्म्यै देवताभ्यो नमः मुखे। 5. सोः बीजाय नमः पादयो। 6. विनियोगायः नमः सर्वांगे। करन्यास 1. ¬ सोः अंगुष्ठाभ्याम् नमः। 2. श्री तर्जनीभ्याम् नमः। 3. श्री मध्यमाभ्याम् नमः। 4. श्री ललिता महात्रिपुर संुदर्ये अनामिकाभ्यां नमः। 5. श्री महालक्ष्म्यै कनिष्ठाभ्याम् नमः। 6. नमः करतल कर पृष्ठाभ्याम् नमः। षड्गन्यास 1. ¬ सोः हृदयाय नमः (हृदय का स्पर्श) 2. श्रीं शिर से स्वाहा (सिर का स्पर्श ) 3. श्री शिखाये वषट। (चोटी-बोदी-सिर के मध्य से पीछे के भाग का स्पर्श) 4. ललिता महा त्रिपुर संुदर्ये कवचाये हूं। (छाती का स्पर्श) 5. श्री महालक्ष्म्यै कनिष्ठाभ्याम् नमः (हाथ की पीठ) षडगन्यास- 1. ‘¬ सोः हृदयाय नमः (हृदय का स्पर्श) 2. श्रीं शिर से स्वाहा (सिर से स्पर्श करें) 3. श्री शिखाये वषट। (चोटी-बोदी-सिर के मध्य पीछे के भाग का स्पर्श) 4. ललिता महा त्रिपुर सुंदर्ये कचवाये हूं (छाती का स्पर्श) 5. श्री महालल्म्यै नेत्र त्रयायै बौषट। (आंखें का स्पर्श) 6. नमः अस्त्राय फट्’ (दोनों कंधों का दोंनों हाथों से स्पर्श) श्रीः मंत्र ‘‘¬ सोः श्रीं श्रीं ललिता महात्रिपुरा सुंदर्ये श्री महालक्ष्म्यै नमः।’’ विधि- साधक स्वच्छ निर्मल लाल रंग के वस्त्र धारण करके, किसी शुभ मुहूर्त में श्री यंत्र को स्थापित करके संकल्प, विनियोग, न्यासादि करें। फिर ध्यान, पूजन आदि कर के श्री विद्या मंत्र का कमलगट्टे अथवा रुद्राक्ष की माला से पांच माला जप नियमित रूप से करें, यंत्र सिद्ध हो जाएगा।

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श्री विद्या विशेषांक मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.