वास्तु शास्त्र | घर की समृद्धि एक लिए पायरा वास्तु उपाय
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घर की समृद्धि के लिए पायरा वास्तु उपाय प्रो. डाॅ. जितेन भट्ट पायरा वास्तु एक अद्भुत व्यावहारिक विज्ञान है जिसमें आज्ञाबद्ध पिरामिड यंत्रों के सही स्थापन मात्र से आत्मा, मन व परिवेश के मध्य संपूर्ण सामंजस्य स्थापित कर उत्तम स्वास्थ्य, प्रसन्नता एवं समृद्धि प्राप्त की जा सकती है। ऊर्जा को अपने अनुकूल बनाने की यह विधि बहुत उपयोगी है। किसी घर, दुकान, फैक्ट्री के भौतिक ढांचे को तोड़े-फोड़े या नुकसान पहुंचाए बिना वास्तु और फेंगशुई दोषों को इसके द्वारा दूर किया जा सकता है। पायरा वास्तु पूर्व आज्ञाबद्ध पिरामिड यंत्र की सहायता से केंद्र स्तर पर सुधार के द्वारा सामंजस्य और संतुलन स्थापित करने वाला शक्तिशाली विज्ञान है। यह ब्रह्मांड के नियमों और सूक्ष्म शरीर रचना के प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है। यहां हम अपने केंद्र में छिपी हुई क्षमताओं का उपयोग अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए करते हैं। पायरा वास्तु, वास्तु और फेंगशुई का पूरक है पर इसकी गतिशील क्रिया ठीक दूसरे छोर से प्रारंभ होती है। यह निरोग होने के लिए दवा और ध्यान दोनों करने के समान है। पायरा वास्तु का प्रथम सिद्ध ांत है कि पदार्थ से ऊपर मन है। जिस तरह ऊर्जा पदार्थ से अधिक शक्तिशाली है उसी तरह मन शरीर से अधिक शक्तिशाली है। उसी तरह यंत्र निर्माण से और केंद्र यंत्र से अधिक शक्तिशाली है। आधार: सूक्ष्म स्तर पर काम करने के लिए हमें सूक्ष्म रचना की अच्छी तरह जानकारी होनी चाहिए। इन क्रियाओं के माध्यम से प्राप्त ऊर्जाओं से ही हमें जगत की अनुभूति होती है। शुद्ध तत्व शिव और शक्ति के रूप में विभाजित है, जो कामना, ज्ञान और क्रिया की तीन शक्तियों से संवाद करता है जो ब्रह्मांडीय प्रक्रिया के मुख्य क्रियाशील बिंदु हैं। उसके बाद मानसिक तत्व आता है जिसे माया शक्ति कहते हैं। वह पांच वर्गों में विभाजित है - कला, विद्या, राग, काल और नियति। ये पांच हमारे ज्ञान पर परदा डालते हुए सच्चाई को ढक देते हैं। इसके बाद भौतिक तत्व है जो पुरुष और प्रकृति अर्थात नर नारी के रूप में विभक्त है। प्रकृति के तीन रूप हैं - सत्व, रजस और तमस जो आगे मस्तिष्क के तीन भाग, 5 ज्ञानेंद्रियों, 5 कर्मेंद्रियों, 5 सूक्ष्म और 5 स्थूल तत्वों में विभाजित हैं। प्रमुख सिद्धांत: पायरा वास्तु प्रमुखतः फा-मा से संबंधित है जो दृढ़ इच्छा शक्ति और शुद्ध प्रेम या दूसरे शब्दों में मन और भावनाओं पर आधारित है। साथ ही 5 सूक्ष्म और 5 स्थूल तत्व और उनके आंतरिक संबंध परस्पर भूमिका अदा करते हैं। पायरा अग्नि: अनादि काल से हिंदुओं तथा अन्य धर्मों में अग्नि को पवित्र माना गया है। यह धार्मिक कार्यों का अभिन्न अंग है। अग्नि से सामंजस्य स्थापित करने की क्रिया पायरा वास्तु के लिए आधारभूत आवश्यकता है। पायरा अग्नि करने की पद्धति बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आकाश में स्थित प्रत्येक कण और अणु में समन्वित जागरूकता सृजित होती है जहां यह कार्य होता है। यह क्रिया प्रतिवर्ष, प्रतिमाह, प्रतिसप्ताह या प्रतिदिन भी की जा सकती है। यदि आप पायरा अग्नि को पूरे धार्मिक भाव से करते हैं तो पायरा वास्तु का एक मुख्य कार्य पूरा हो जाता है। ब्रह्म स्थल के लिए पायरा वास्तु: पायरा वास्तु में ब्रह्म स्थल का विशेष महत्व है। मध्य से जाने वाली ऊर्जा रेखाएं भी समान रूप से महत्वपूर्ण होती हैं। प्राचीन समय में लोग ब्रह्म स्थल के महत्व को जानते थे और इसलिए घर के मध्य में तुलसी पौधा या पूजागृह बनाते थे। प्रतिदिन प्रातः मध्य भाग को ऊर्जित करने के लिए तुलसी की पूजा की जाती थी। अतः इसे क्रियाशील करना बहुत आवश्यक है। इसी तरह पायरा वास्तु में यह विश्वास किया जाता है कि यदि ब्रह्मस्थल को कील, खूंटी, खंभें, भारी वस्तु आदि से चोट पहुंचाई जाए तो गृहस्वामी को कष्ट पहुंच सकता है। इसलिए ब्रह्मस्थल को ठीक से सुरक्षित और सक्रिय रखना नितांत आवश्यक है। क्या करें यदि दीवार, सीढ़ी या शौचालय ब्रह्मस्थल में हो ? एक सर्वेक्षण के अनुसार 60 प्रतिशत छोटे घरों में ये चार वास्तु दोष प्रायः पाए जाते हैं। काटो और दूर करो तकनीक से इन दोषों को बहुत सरलता से दूर कर सकते हैं। पहले ब्रह्मस्थल पता कर लें और यदि वहां दीवार, सीढ़ी, शौचालय या खंभा हो तो निम्न तरीका अपनाकर उन्हें दूर करें। ब्रह्म स्थल में दीवार: ऐसा प्रायः होता है कि ब्रह्म स्थल पर कमरे की दीवार या कोई भारी वस्तु हो। इसे वहां से हटाना है। यदि वह कोई वस्तु हो तो आप उसे हटा सकते हैं। परंतु एक दीवार को गुणात्मक रूप से ही हटाना होगा। दीवार पर 3 मल्टियर पिरामिड यंत्र लगाएं या मध्य में एनर्जी प्लेट तथा कोनों पर चार पायरा कोन चित्र 2 के अनुसार लगा सकते हैं। ब्रह्मस्थल पर भारी खंभा: पायरा वास्तु के अनुसार ब्रह्मस्थल पर खंभा नुकसानदेह होता है। इस समस्या के दो हल हैं। पहला यह है कि खंभे के चारों ओर या जमीन या छत पर मल्टियर पिरामिड यंत्र लगाएं दूसरा और बेहतर हल यह है कि मकान की सीलिंग में पायरा स्ट्रिप लगाकर उसे दो भागों में बांट दें और दोनों के ब्रह्मस्थल को अलग अलग ऊर्जित करें। ब्रह्म स्थल में सीढ़ी: यदि सीढ़ी गोल है तो उसके चारों ओर 8 पिरामिड यंत्र चित्र 5 के अनुसार लगाएं। ये फर्श के नीचे या ऊपर सीलिंग पर लगाए जा सकते हैं। यदि फर्श के नीचे पिरामिड यंत्र लगाना संभव हो तो सीलिंग में पायरा पट्टी लगा कर आप उसे अलग कर सकते हैं। ब्रह्म स्थल में शौचालय: यह बहुत ही गंभीर दोष है अतः यदि संभव हो तो शौचालय को ब्रह्मस्थल से हटा देना चाहिए। यदि यह संभव नहीं हो तो शौचालय की बाहरी दीवार पर 3 पिरामिड यंत्र इस तरह लगाएं कि जिस ओर शौचालय को गुणात्मक रूप से हटाना है उसके दूसरी ओर उनके शीर्ष बिंदु रहंे जैसा कि चित्र 7 में दर्शाया गया है। सभी पिरामिड यंत्र उत्तर की ओर शीर्ष बिंदु रखते हुए लगाएं ताकि वह दक्षिण की ओर हट सके। पायरा स्ट्रिप से प्रभावात्मक रूप से विभाजित करना भी इसका एक उपाय है। मुख्य द्वार और सीमा द्वार का पायरा वास्तु: पायरा वास्तु में मुख्य द्वार या मुख्य सीमा द्वार का विशेष महत्व है। शुभ परिणाम पाने के लिए द्वार नीचे दिए गए चित्र के अनुसार सही स्थान पर होना चाहिए। यदि आपका मुख्य द्वार सही स्थान पर नहीं है तो उसका सुधार पिरामिड यंत्र द्व ारा द्वार को ऊर्जित कर, या पिरामिड यंत्र लगाकर द्वार को प्रभावात्मक रूप से सही स्थान पर हटाकर किया जा सकता है। भाग्य वृद्धि के लिए द्व ार ऊर्जित करना: मुख्य द्वार को क्रियाशील और ऊर्जित रखना आवश्यक है। पहले इसे शुभ-लाभ, घोड़े की नाल या प्रवेश पर रंगोली आदि से ऊर्जित किया जाता था। पर अब शीघ्र क्रियाशील, वैज्ञानिक हल के लिए पिरामिड का उपयोग किया जाता है। आप अपने द्वार पर तीन पिरामिड यंत्र लगाकर उसे ऊर्जित कर सकते हैं -चित्र के अनुसार एक द्वार के ऊपर और एक-एक दोनों तरफ। यह सबसे अच्छी स्थिति है पर यदि आपके द्वार के ऊपर या दोनों तरफ इसे लगाने के लिए जगह नहीं है तो इन्हें सीलिंग या बाजू की दीवार पर भी लगा सकते हैं। और अधिक अच्छे परिणाम के लिए बीमोर 9ग9 है। (बीमोर में 9 कमलयुक्त ़ऊर्जा प्लेटें होती हैं।) इन्हें अपनी इच्छा या विशेष कार्य हेतु भी क्रियाबद्ध किया जा सकता है। रसोई घर का पायरा वास्तु ः परिवार के स्वास्थ्य की दृष्टि से रसोई घर का स्थान महत्वपूर्ण है। अतः उसे घर या रेस्टोरेंट में आग्नेय कोने में होना चाहिए। आग्नेय अर्थात दक्षिण-पूर्व दिशा। रसोई घर के द्वार के सामने शौचालय: यदि रसोई घर का द्व ार शौचालय के सामने हो तो उससे रसोई घर में नकारात्मक ऊर्जा आती है जो आपके स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करती है। इस नकारात्मक प्रवाह को रोकने के लिए आपको सीलिंग में नीचे की ओर शीर्ष बिंदु रखकर दोनों द्वारों के बीच पिरामिड यंत्र लगाकर एक प्रभावात्मक विभाजन करना होगा। इस विभाजन के लिए पायरा स्ट्रिप का उपयोग किया जा सकता है। दक्षिणाभिमुख होकर रसोई पकाना: अन्न का प्रभाव हम पर पूर्ण रूपेण पड़ता है। अतः रसोई घर तथा रसोई बनाने वाले के मध्य पूर्ण सामंजस्य होना आवश्यक है। रसोई घर दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए किंतु बनाने वाले का मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए। अगर यह इसके विपरीत है तो चित्र में दर्शाए गए तरीके से दक्षिण दीवार पर पिरामिड यंत्र लगाएं या एनर्जी 9ग9 प्लेट लगाएं। अग्नि और जल का संघर्ष ः यह दो विपरीत तत्वों का संघर्ष है जो परिवार में झगड़ा कराता है। सामान्यतः अग्नि और जल एक ही प्लेटफार्म पर होते हैं या रसोई के तुरंत बाद धोने का स्थान या पानी की टंकी होती है। ऐसी स्थिति में आप उन्हें पिरामिड यंत्र या पिरामिड स्ट्रिप से अलग कर सकते हैं। शयन कक्ष के लिए पायरा वास्तु: शयनकक्ष वह स्थान है जहां आप अपने जीवन का एक तिहाई समय गुजारते हैं। इसलिए वह सही स्थान अर्थात दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए। यदि नहीं है तो उसे प्रभावात्मक (गुणात्मक) रूप से वहां करना चाहिए। शयन कक्ष अच्छी तरह संचालित हो तथा उसकी आकृति, दीवारें कम से कम टेढ़ी हों। शयन कक्ष व्यवस्थित तथा स्वच्छ हो। क्या करें यदि शयन कक्ष दक्षिण-पश्चिम (नैर्ऋत्य) में नहीं हो? शयन कक्ष आ ै र विश े ष् ा कर गृहस्वामी का शयन कक्ष दक्षिण-पश्चिम में होना चाहिए पर यदि वह चित्र के अनुसार उत्तर-पूर्व (ईशान) में हो तो उसे दक्षिण और पश्चिम की दोनों दीवारों पर 3-3 मल्टियर पिरामिड यंत्र लगाकर सही स्थान पर हटाना होगा। यदि शयन कक्ष के साथ शौचालय हो तो क्या करें? शयन कक्ष शौचालय से अलग होना चाहिए। पर यदि सटा हो तो उसे प्रोटेक्ट डोर बेंड या पायरा स्ट्रिप लगाकर शौचालय से अलग करना चाहिए। शौचालय के अंदर कभी भी पिरामिड यंत्र नहीं लगाना चाहिए। क्या दर्पण भी कष्टकारक हो सकता है? हां, यदि वह बायीं ओर खुलता हो। विशेष कर शयनकक्ष के वे सभी दर्पण जो सोने के समय सामने पड़ते हों, शरीर में दर्द और कई बीमारियों के कारण बनते हैं। इसका हल यही है कि सोते समय दर्पण को ढक दें या उस पर परदा लगा दें और उसमें संतुलन के लिए 9 पिरामिड चिप्स लगाएं। क्या होगा यदि द्वार के सामने पलंग हो? दरवाजे के सामने पलंग नहीं रखना चाहिए। द्वार से निरंतर प्रवहमान ऊर्जा व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। सोते समय दरवाजा बंद कर दें अथवा पलंग को तीन प्रोटेक्ट इन्साइड से सुरक्षित कर दें। क्या पलंग पर छत का झुकाव और बीम तनाव देते हैं? छत का ढाल उत्तर (नीचे) की ओर से दक्षिण (ऊंचे) की ओर या पूर्व से पश्चिम की ओर होना चाहिए। यदि वह उल्टा है या ऊंचाई में कम है तो वह व्यक्ति को तनावग्रस्त बनाता है। जहां छत नीची हो वहां दीवार पर या पलंग के नीचे 3 पिरामिड यंत्र लगाएं। यदि आप बीम के नीचे सोते हों तो 3$3 पिरामिड यंत्र दीवार पर बीम में नीचे लगाएं ताकि नकारात्मक प्रभाव कम हो सके। बालकनी और खुली छत: वास्तु के अनुसार बालकनी या खुली छत का उत्तर या पूर्व दिशा में होना उत्तम है मगर उत्तर-पूर्व कोने वाली (ईशान) दिशा में उनकी स्थिति सर्वोत्तम रहती है। यदि बालकनी दक्षिण पश्चिम या पश्चिम में हो तो स्थापित क्षेत्र की भीतरी दीवार पर पायरा स्ट्रिप लगाकर उसे अलग कर सकते हैं। पिरामिड यंत्र लगाने के लिए दोनों ओर चिपकने वाला टेप या पीतल के स्क्रू लगाएं। लोहे की कीलें वर्जित हंै। अगर जगह बड़ी हो तो पायरा स्ट्रिप 3 के गुणांक में दोनों ओर लगा सकते हैं। बेसमेंट: बेसमेंट किसी भवन, दुकान या कारखाने के उत्तर और पूर्व दिशा में होना चाहिए न कि दक्षिण और पश्चिम में। इसका उपयुक्त स्थान उत्तर-पूर्व (ईशान) है। यदि चित्र के अनुसार बेसमेंट दक्षिण या पश्चिम में हो तो बेसमेंट में ऊध्र्व ऊर्जा प्रवाह पद्धति के अनुरूप चारों कोनों और ब्रह्मस्थल पर मल्टियर या मैक्स लगाएं। गैरिज और सेवक कक्ष: नौकरों का कमरा व वाहन कक्ष उत्तर-पूर्व में नहीं होने चाहिए। लेकिन यदि ये इन दिशाओं में स्थित हों और इन्हें सही दिशा में लाना सं. भव नहीं है तो मल्टियर या मैक्स से उन्हें प्रभावात्मक रूप से शिफ्ट कर सकते हैं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है उसके अनुसार बाहरी दीवार पर पिरामिड लगाएं। शौचालय: स्नानगृह और शौचालय का उपयुक्त स्थान दक्षिण

व्यूस: 2172

वास्तु विशेषांक दिसंबर 2007

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