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रुद्राक्ष अथवा रत्न तुलनात्मक अध्ययन (1 व्यूस)

रुद्राक्ष का उपयोग विभिन्न कार्यो के लिए किया जाता है. जैसे- रोग चिकित्सा, सुख शांति एवं ग्रह दोष निवारण. इसके अलावा रुद्राक्ष का वास्तु दोष दूर करने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। जैसे- दस मुखी रुद्राक्ष को दस दिशाओं के दोष दूर करने के लिए धारण किया जाता है। यह कैसे निर्धारित करें कि रत्न धारण करना सही होगा या रुद्राक्ष?

रुद्राक्ष धारक के शरीर की नकारात्मक शक्तियों को स्वयं में खिंचता है इसके विपरीत रत्न अपनी सकारात्मक शक्तियों को शरीर में प्रवाहित करते है। रुद्राक्ष शरीर की औरा शक्ति को बढ़ाता है। हमारे शरीर में नकारात्मक शक्तियों को कम कर सकारात्मक शक्तियों को बल प्रदान करता है। अभिमंत्रित रुद्राक्ष में आध्यात्मिक शक्तियों का केन्द्र होता है। रुदाक्ष धारण का काई भी विपरीत प्रभाव नहीं होता है। रत्न रश्मियों को शरीर में प्रवाहित करते है। जबकि रुद्राक्ष नकारात्मक शक्तियों को अवशोषित करता है। रत्न केवल शुभ ग्रहों का धारण किया जाता है। रत्न धारण से शुभ ग्रह की शुभता बढ़ती है। परन्तु रुद्राक्ष शुभ ग्रह और अशुभ ग्रह दोनों का धारण किया जा सकता है।

सभी लग्न के व्यक्ति रुद्राक्ष धारण कर सकते है। इसके विपरीत सभी लग्न के व्यक्तियों को सभी रत्न धारण करने की सलाह नहीं दी जा सकती है। रत्न को एक अवधि विशेष के बाद बदलने की सलाह दी जाती है। परन्तु रुद्राक्ष को बदलने की जरुरत नहीं पड़ती है। इसके अलावा रुद्राक्ष को मंत्र जाप के लिए प्रयोग किया जाता है। इस कारण इनकी आन्तरिक शक्तियां बनी रहती है। रुद्राक्ष को स्वर्ण, रजत और ताम्र तीनों धातुओं में जड़ित कर पहना जा सकता है। खंडित होने अथवा माला के दाने बिखर जाने की स्थिति में रुदाक्ष को वापस धारण नहीं करना चाहिए। ऐसे में इन्हें जल में प्रवाहित कर दूसरा रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। रुद्राक्ष से विशेष लाभ प्राप्त करने के लिए इसे स्वर्ण या रजत धातु में धारण करना चाहिए। जो रुद्राक्ष माला रूप में पहने जाते है वो सामान्यत: मलेशिया के रुद्राक्ष दानों से निर्मित होते है। नेपाल के रुद्राक्ष का आकार बड़े होने के कारण माला रूप में कम ही प्रयोग किए जाते है। रुद्राक्ष धारण करने के बाद इन्हें लैब टेस्ट अवश्य कराना चाहिए। इससे इनकी गुणवत्ता निर्धारित होती है।


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