वास्तु के कारण ही प्रसिद्ध एवं समृद्धशाली है तिरूप्पति बालाजी

वास्तु के कारण ही प्रसिद्ध एवं समृद्धशाली है तिरूप्पति बालाजी  

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तिरूमला का विश्व प्रसिद्ध भगवान तिरूप्पति श्री वेंकटाचलपति का मंदिर शेषांचल पर्वत पर समुद्र तल से 2500 फीट ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर के चारांे ओर ईशान कोण को छोड़कर पर्वत श्रृखंलाएं है, जो मंदिर परिसर के पास से ही दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में ऊंचाई लिए हुए है जबकि उत्तर और पूर्व दिशा के पर्वत कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर में भगवान तिरूप्पति बालाजी पूर्वमुखी होकर विराजमान है। इस मंदिर में भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व से लोग अपनी मुरादें मांगने एवं मुराद पुरी होने पर दर्शन करने एवं भेंट चढ़ाने आते है। यहां आस्था, श्रद्धा और भक्ति से लबरेज भक्तों का माथा टेकने के लिए सदैव तांता लगा रहता है। मंदिर की प्रसिद्धि का अनुमान इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि यहां विशेष पूजा कराने के लिए भक्तों को सालो-साल इंतजार करना पड़ता है और समृद्धि का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि तिरूप्पति बालाजी का मंदिर विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न धार्मिक स्थानों में दूसरे स्थान पर है। श्री तिरूप्पति बालाजी मंदिर की इस विश्व प्रसिद्धि एवं समृद्धि में इसके उत्कृष्ट वास्तु के अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान को नकारा नहीं जा सकता है, तिरूप्पति बालाजी के मंदिर की बनावट के साथ-साथ तिरूमाला की भौगोलिक स्थिति भी पूर्णतः वास्तुनुकुल है। जैसे कि इजिप्ट स्थित गीजा के पिरामिड़ की बनावट एवं भौगोलिक स्थिति। ऐसी वास्तुनुकुलता दुर्लभ ही देखने में आती है। जो कि इस प्रकार है -

तिरूप्पति बालाजी का मंदिर आंध्रप्रदेश के दक्षिण छोर पर बना है। वास्तु सिद्धांतों के अनुसार किसी भी शहर या राज्य का दक्षिण-पश्चिम दिशा वाला भाग वैभवशाली होता है।

तिरूप्पति से तिरूमला की ओर सड़क मार्ग से आते समय ळडब् टोल गेट तक जहां से तिरूमला प्रारंभ होता है वहां तक पर्वत में चढ़ाई है। इस गेट के बाद से ही सड़क में उत्तर दिशा की ओर ढलान शुरू हो जाती है जो कि उत्तर और पूर्व दिशा में बहुत दूरी पर स्थित पर्वत तक चली जाती है। ळडब् टोल गेट के आगे मंदिर परिसर के प्रारंभ होने के काफी पहले फ्री बस सेवा का स्टैण्ड है और उसके बाद सीधे हाथ पर कल्याण काट (मुण्डन की जगह) भवन है, जहां भक्त जन अपने केश काट कर भगवान को समर्पित करते है। यहां पर्वत में ळडब् टोल गेट से लगातार उत्तर और पूर्व दिशा की ओर ढलान है। पर्वत के ढलान पर यह सड़क आगे बढ़ती हुई मंदिर परिसर के सामने से होती हुई आगे निकल गई है। जहां यह सड़क आगे उत्तर की ओर जाने के साथ-साथ ईशान कोण में गहरी ढलान लिए हुए है। जहां से यह सड़क ज्ज्ठ कार पार्किंग की ओर भी मुड गई है।

मंदिर परिसर को दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित पर्वत की तलहटी पर समतल करके बनाया गया है। परिसर की दक्षिण दिशा में ऊंचाई है जहां पर भोजनशाला, बैंक स्ट्रीट और अन्य भवन बने हुए है परिसर से यहां आने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है और परिसर की पूर्व और उत्तर दिशा की ओर ढलान है। मंदिर परिसर के ईशान कोण में मानव निर्मित तालाब स्वामी पुष्करणी है। जहां भक्तजन स्नान करते है। मंदिर परिसर की उत्तर दिशा में भी दूर तक ढलान है। वहां से तीन किलोमीटर दूर आकाश गंगा जलप्रपात है। प्रतिदिन भगवान की पूजा के लिए यहां का जल ही उपयोग में लाया जाता है। मंदिर परिसर की उत्तर दिशा की इन भौगोलिक वास्तुनुकुलता के कारण ही यह मंदिर प्रसिद्ध है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में ऊंचाई हो और उत्तर दिशा की ओर ढलान हो तो वह स्थान, भवन, शहर प्रसिद्धि पाता है। जैसे जयपुर की पिंक सिटी वाले भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर ढलान है, गुडगांव में भी दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर ढलान है। ताज महल के उत्तर दिशा में यमुना नदी बह रही है। उत्तर दिशा की वास्तुनुकुलता ही हर की पौढ़ी वाले क्षेत्र को भी विशेष प्रसिद्धि दिलाने में अत्यधिक सहायक हो रही है।

तिरूमला की प्रसिद्धि बढ़ा रही उत्तर दिशा की भौगोलिक स्थिति में चार चांद लगा रहे है दक्षिण दिशा से आते हुए दो मार्ग प्रहार। एक दक्षिण दिशा स्थिति ळडब् टोल गेट से आती मुख्य सड़क बाॅयलर हाऊस पर मंदिर परिसर के दक्षिण आग्नेय को प्रहार करती हुई पूर्व की ओर मुड़ गई है। दूसरी बैंक स्ट्रीट व भोजनशाला वाली सड़क भी मंदिर परिसर के दक्षिण आग्नेय को मार्ग प्रहार कर रही है।

दक्षिण आग्नेय के दो मार्ग प्रहारों के अलावा मंदिर परिसर को दो और मार्ग प्रहार हो रहे है। एक मार्ग प्रहार आस्थान मण्डपम के पास परिसर के पूर्व आग्नेय को हो रहा है जहां इस मार्ग पर मंदिर की ओर अंतिम छोर पर नारियल हुण्डी है। भौगोलिक स्थिति के कारण यह मार्ग ऊंचाई लिए हुए है। इसलिए नारियल हुण्डी से मंदिर परिसर में जाने के लिए सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। इसके बाद मंदिर परिसर की पूर्व दिशा एवं पूर्व ईशान में पहाड़ी का ढलान इतना अधिक हो गया है कि रामबगीचा गेस्ट हाऊस के सामने स्थित मार्ग मंदिर परिसर के लेवल पर ही है। इस मार्ग से परिसर में जाने के लिए कोई सीढ़ी नहीं उतरना पड़ती।

मंदिर की पूर्व दिशा में ळडब् टोल गेट से आने वाली सड़क पूर्व ईशान की ओर मुड़ती हुई काफी ढलान लिए हुए है। सड़क की पश्चिम दिशा में एक तरफ तो मंदिर परिसर है तो दूसरी तरफ पूर्व दिशा की ढलान पर राम बगीचा बस स्टैण्ड, शाॅपिंग काॅम्पलेक्स बने है। यह ढलान पूर्व दिशा में बहुत दूर तक है जहां बहुत बड़े भाग पर कर्मचारियों के लिए मल्टीस्टोरी फ्लैट बने हुए है और इन फ्लैट्स से बहुत दूरी पर पहाड़ है। जबकि दूसरी ओर मंदिर परिसर की पश्चिम दिशा में परिसर के पास ही पहाड़ प्रारंभ हो जाता है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार पश्चिम दिशा में ऊंचाई और पूर्व दिशा में ढलान हो तो वहां समृद्धि रहती है। मंदिर परिसर की पूर्व और पश्चिम दिशा की वास्तुनुकुल भौगोलिक स्थिति नेे ही तिरूप्पति बालाजी के मंदिर को इतनी समृद्धि और वैभव दिया है और यहां भी उसमें चार चांद लगा रहा है राम बगीचा गेस्ट हाऊस वाला पूर्व ईशान का मार्ग प्रहार।

पिछले कुछ वर्षों में दर्शन के लिए आने वाले भक्तों की बढ़ती भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मंदिर परिसर में कुछ नये निर्माण कार्य किये गए है। जिसमें वास्तु सिद्धांतों की अवहेलना हुई है। इस कारण उपरोक्त विलक्षण वास्तुनुकुलताओं के साथ-साथ मंदिर में कुछ वास्तुदोष भी आ गए है जैसे कि, मंदिर आंगन के चारों कोने ढंके हुए है। जैसे दक्षिण दिशा में झूला मण्डप, ईशान कोण में दो तलों का कमरा बना हुआ है। इन चारों कोने का ढंका हुआ होना वास्तु की दृष्टि से अनुकुल नहीं है। मंदिर परिसर के पूर्व दिशा के दो मार्ग प्रहार में से पूर्व आग्नेय में नारियल हुण्डी वाला मार्ग प्रहार शुभ नहीं है। वास्तुशास्त्र के अनुसार पूर्व आग्नेय का मार्ग प्रहार कलह और विवाद का कारण बनता है। जो कि वहां सामान्यतः होते रहते है।

मंदिर परिसर की दक्षिण दिशा वाले भाग में दक्षिण के साथ मिलकर नैऋत्य कोण में बढ़ाव है। जहां वैकुण्ठ क्यू काॅम्पलेक्स है। यह भी एक महत्वपूर्ण वास्तुदोष है। वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा के वास्तुदोष का कुप्रभाव विशेषकर स्त्रियों पर पड़ता है। निश्चित ही दक्षिण दिशा के इस दोष का प्रभाव तिरूमला एवं तिरूप्पति में जो महिलाएं रहती है या दर्शन करने आती है उन पर पड़ रहा है। किंतु अद्भुत अद्वितीय वास्तु शक्ति वाले इस मंदिर में उपरोक्त वास्तुदोष अपना कोई प्रभाव खुले रूप में नजर नहीं आ पाता है। उसी प्रकार जैसे कि, एक ग्लास पानी में चार चम्मच शक्कर डली हो उसमें यदि चुटकीभर नमक डाल दिया जाए तो वह पानी पीने पर नमक के स्वाद का पता नहीं लगेगा। परंतु इस घोल को पीने के बाद शक्कर और नमक अपनी-अपनी मात्रा के अनुसार शरीर पर अपना प्रभाव तो डालते ही है।

अतः तिरूमला-तिरूप्पति देवस्वम बोर्ड को चाहिए कि उपरोक्त वास्तुदोषों को दूर करें और भविष्य में होने वाले नये निर्माण को करवाते समय वास्तु के नियमों के पालन का ध्यान रखें। नहीं तो कहीं ऐसा ना हो कि वास्तु का ध्यान न देने से मंदिर के बढ़ते वास्तुदोष इस मंदिर की प्रसिद्ध और वैभव को प्रभावित करने लगे।



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