मेहरबान होंगे शनि वृष, सिंह धनु और मकर पर

मेहरबान होंगे शनि वृष, सिंह धनु और मकर पर  

मेहरबान होंगे शनि वृष, सिंह, धनु और मकर पर पं. सुनील जोशी जुन्नरकर शनि देव प्रत्येक ढाई वर्ष में राशि परिवर्तित करते हैं। शनि के राशि बदलने के साथ ही, राशियों पर शनि का प्रभाव भी बदल जाता है। नवंबर माह में होने वाला शनि राशि परिवर्तन किसके चेहरे पर मुस्कान और किसे खून के आंसू रूलायेगा इस लेख से जाना जा सकता है। सूर्य पुत्र शनिदेव अंतरिक्ष में अपने पिता की परिक्रमा करते हुए लगभग 30 वर्ष बाद दिनांक 15 नवंबर 2011 को चित्रा नक्षत्र के तृतीय चरण- ‘तुला’ राशि में प्रवेश करेंगे। अपने मित्र शुक्र की राशि ‘तुला’ शनिदेव का उच्च स्थान है। शनिदेव मंद गति से गोचर करते हुए 30 अंश की एक राशि को लगभग साढ़े 29 माह में पार कर लेते हैं। इस दौरान वे वक्री-मार्गी, उदय व अस्त होते हैं। दिनांक 07 फरवरी 2012 से शनिदेव तुला राशि में वक्री होंगे। मई 2012 से वक्रगत्या शनि कन्या राशि में पहुंच जाएंगे। 24 जून 2012 को मार्गी होंगे। नवंबर 2012 में सूर्य के समीप जाकर तुला राशि में अस्त हो जाएंगे। सिंह, वृष, धनु पर शनि की विशेष कृपा होगी: ‘‘तुष्टो ददासि वै राज्यं, रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।’’ महर्षि कश्यप द्वारा रचित शनि स्तोत्र के अनुसार- ‘‘शनिदेव’’ संतुष्ट या प्रसन्न होने पर भिखारी को भी राजा के समान सुख दे देते हैं और रुष्ट होने पर राजााअें के राज्य छीनकर उन्हें क्षण भर में भिखारी बना देते हैं। इसलिए शनि चालीसा में कहा गया है- ‘‘जा पर प्रभु प्रसन्न हुई जाहीं। रंकहुं राव करे क्षण माही।।’’ प्रश्न उठता है कि शनिदेव कब, किससे या किस पर प्रसन्न होते हैं? गोचरीय शनि जब अपनी उच्च या मूल त्रिकोण राशि में हो और जिस व्यक्ति की जन्म लग्न या जन्म राशि से 3, 6, 11वें स्थान में शनि भ्रमण करता हो। उस समय एवं उस व्यक्ति पर शनिदेव अपनी प्रसन्नता एवं कृपा बरसाते हैं। तुला राशि शनि की उच्चराशि है। उच्चराशि में ग्रह दीप्त अवस्था में होता है, दीप्तावस्था में ग्रह शत-प्रतिशत शुभफल देता है। तुला राशि विषम राशि है, विषम राशि में 10 अंश तक ग्रह जाग्रत होता है। जाग्रतावस्था कार्य सिद्धि कराने वाली होती है। अतः तुला राशि में गोचरीय शनि सिंह, वृष, धनु लग्न व जन्मराशि वाले व्यक्तियों पर प्रसन्न होकर अपनी कृपा प्रसाद से उन्हें राजसी (शाही) सुख देंगे। सिंह, वृष, धनु के जातकों को क्रमशः ऐश्वर्य सुख, विजय सुख व धन लाभ का सुख प्राप्त होगा। तुला में अधिक शनि रेखा वालों की चांदी: जन्म राशि से गोचरीय ग्रहों के फल का यदि अष्टकवर्ग के फल से तारतम्य देखा जाए तो फलकथन में परिपक्वता एवं विश्वसनीयता आती है। क्योंकि गोचरीय ग्रहों का फल बहुत अंशों तक अष्टकवर्ग पर निर्भर करता है। जिस जातक की अधिक रेखायुक्त राशि में जब शनि प्रवेश करेगा। तब उस जातक को शनि संबंधी शुभ फलों की प्राप्ति होगी तथा लग्न से जिस भाव में वह राशि हो उस भाव से संबंधित शुभ फलों की वृद्धि का लाभ मिलेगा। उदाहरणार्थ, जिस व्यक्ति के शन्याष्टक वर्ग कुंडली के तुला राशि में शनि की 4 या 4 से अधिक शुभाष्टक रेखाएं हों। उस व्यक्ति को तुला के गोचरीय शनि का शुभफल अवश्य प्राप्त होगा। फिर चाहे भले ही शनि जन्म राशि से अशुभ (12, 1, 2, 4, 8) स्थानों में गोचर कर रहा हो। क्योंकि उपरोक्त स्थिति में उसे शनि का शुभ रेखाष्टक बल प्राप्त हो जाएगा। यदि जन्मराशि से शुभ (3, 6, 11) स्थान में शनि का गोचरयी हो और तुला राशि में शन्याष्टक की 4 या 4 से अधिक रेखाएं हों, तो सर्वाधिक शुभ फल प्राप्त होगा। इसके विपरीत जितनी कम रेखाएं होंगी उतना ही ज्यादा अशुभ फल प्राप्त होगा। शनि ढैया व साढ़ेसाती से भयभीत न हों: मनुष्य जीवन पर पड़ने वाले गोचरीय ग्रहों के प्रभाव में शनि का सर्वाधिक प्रभाव दिखाई देता है। जन्मराशि से 1, 2, 4, 5, 7, 8, 9, 12वें स्थान में शनि का भ्रमण पीड़ा दायक होता है। जन्मराशि से जब शनि 12, 1, 2 स्थानों में होता है, तब उन राशि के जातकों को शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहता है। गोचर का शनि जन्मराशि से जब चैथे या आठवें स्थान में रहता है, तब शनि की ढैया होती है। दिनांक 15 नवंबर 2011 को जब शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा तब उस दिन से सिंह राशि वाले जातकों की साढ़ेसाती एवं मिथुन व कुंभ राशि वाले जातकों की ढैया समाप्त हो जायेगी। वृश्चिक राशि वाले जातकों को साढ़ेसाती की प्रथम ढैया, तुला वालों को दूसरी ढैया और कन्या राशि वालों को तीसरी ढैया प्रारंभ हो जायेगी। कर्क राशि को चतुर्थ ढैया एवं मीन को अष्टम ढैया प्रारंभ हो जाएगी। पिछले तीन दशक में यह दूसरा मौका है, जबकि साढ़ेसाती व ढैया शनि का गोचर शुभ फलदायी होगा। क्योंकि तुला राशि शनि की उच्चराशि है, सिद्धांतानुसार उच्चराशि में ग्रह अपना शुभफल शत-प्रतिशत देता है। इस कारण यह ढाई वर्ष का समय शनि की साढ़ेसाती व ढैया बृहद कल्याणी व लघु कल्याणी सिद्ध होगी। नीच व शत्रु राशि में गोचरीय शनि की साढ़ेसाती व ढैया, पनौती व लघु कंटकी कहलाती है। वृश्चिक, तुला व कन्या राशि वाले साढ़ेसाती शनि की (आगामी ढैया) व कर्क, मीन वाले शनि की चतुर्थ, अष्टम ढैया से भयभीत न हांे। उच्चराशि में गोचर का शनि उन्हें कष्ट नहीं देगा। बल्कि अपनी उदारता से उन्हें सुख समृद्धि देगा। उनके रुके हुये कार्य पूर्ण होंगे एवं मनोवांछित अभिलाषाओं की पूर्ति होगी। मकर-कुंभ की खुशियां लौटेंगी: कहते हैं कि 12 वर्ष बाद घूरे के भी दिन बदल जाते हैं। यह कहावत मकर, कुंभ राशि पर ठीक बैठती हैं। आज से 12-13 वर्ष पूर्व मकर व कुंभ राशि का स्वामी ग्रह शनि अपनी नीच राशि (मेष) में गोचर कर रहा था। उस समय (अप्रैल 1998 से जून 2000 तक) मकर, कुंभ राशि के स्त्री-पुरुष बहुत परेशान व दुःखी थे। किंतु अब (15 नवंबर 2011) से शनि के उच्चराशि (तुला) में पहुंच जाने मकर, कुंभ राशि वालों की खुशियों का पारावार नहीं रहेगा, उनके अच्छे दिन आजाएंगे। अब वे शान से गा सकते हैं- सैंया भये कोतवाल अब डर काहे का...? वृष, तुला लग्न की बल्ले-बल्ले: वृष व तुला लग्न में शनि केंद्र- त्रिकोण का स्वामी होने से अकेला ही राजयोग कारक होता है। वृष लग्न में नवमेश-दशमेश और तुला लग्न में चतुर्थेश-पंचमेश होने के कारण शुभ भावेश हो जाता है। इसलिए वृष व तुला लग्न के जातकों को शनि शुभफल ही प्रदान करता है। वृष व तुला लग्न के जातकों के लिए शनि का तुला राशि में गोचर अन्य लग्नों की तुलना में ज्यादा लाभकारी माना जाता है। क्योंकि वृष व तुला लग्न के योग कारक/शुभ भावेश शनि का उच्च राशि में संचार करने से वह बलवान और शुभ हो जाता है और अपने अधिष्ठित भावों (शुभ भावों) का शुभ फल देता है। जैसे- तुला लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थेश-पंचमेश है तथा वर्तमान में तुला राशि में भ्रमण करेगा तो सुख, भूमि, भवन वाहन तथा मित्र, विद्या, बुद्धि संतान व लक्ष्मी की प्राप्ति करायेगा। तुला राशि के लग्न में गोचर करता हुआ शनि अपनी तीसरी दृष्टि से पराक्रम भाव को देखेगा। सप्तम दृष्टि से सप्तम भाव को देखेगा तो जातक को सहयोगियों से सहयोग की प्राप्ति होगी, बिजनेस पार्टनर व लाइफ पार्टनर गड़बड़ नहीं करेंगे। दांपत्य जीवन व यौन संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। तुला लग्न में संचार करता हुआ शनि दशम दृष्टि से राज्य भाव को देखेगा तो जातक के सरकार, शासन, नेता व वरिष्ठ अधिकारियों से संबंध सुधरेंगे। नौकरी में पदोन्नति व वेतन वृद्धि की प्राप्ति होगी। सरकार समाज से सम्मान की प्राप्ति होगी। यश-कीर्ति फैलेगी और तुला लग्न के जातक प्रतिष्ठित हो जायेंगे। तुला लग्न में गोचरीय शनि और विभिन्न भावों पर उसकी पूर्ण दृष्टियां: कर्क लग्न-स्वास्थ्य व आजीविका में बाधा: कर्क राशि वालों को तुला के शनि की चतुर्थ ढैया कष्ट दायक नहीं होगी, बल्कि मनोवांछित अभिलाषाओं की पूर्ति में सहायक होगी यह बात हमने पूर्व में कही थी। किंतु अब हम बात करते हैं कर्क लग्न की। कर्क लग्न में शनि को सप्तम व अष्टम भावों का आधिपत्य प्राप्त होता है, वहां सप्तमेश होने से वह प्रबल मारक होता है। कर्क लग्न में शनि की मूल त्रिकोण राशि (कुंभ) अष्टम भाव में पड़ती है। इस कारण कर्क लग्न में शनि सर्वाधिक पापी हो जाता है, परिणामतः वह अशुभ फल देता है तथा भाग्य का व्यय करता है। प्रत्येक ग्रह अपनी उच्चराशि में पहुंचकर बलवान हो जाता है, किंतु शत्रु का बलवान होना अपने लिए अच्छा नहीं होता है। इस प्रकार शनि का उच्च राशि (तुला) में गोचर कर्क लग्न के जातकों के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता है। तुला राशि में गोचरीय शनि कर्क लग्न की जन्मकुंडली के सुख भाव (चतुर्थ स्थान) में रहेगा। यहां से उसकी दृष्टि शरीर भाव व रोग-शत्रु भाव पर पड़ेगी। जिसके कारण कर्क लग्न वालों को शारीरिक रोग व शत्रु परेशान करेंगे। मानसिक चिंताएं बढ़ेंगी, शनि की सप्तम दृष्टि आजीविका स्थान पर पड़ेगी, जिससे कर्क लग्न वाले जातकों की आजीविका प्रभावित होगी। उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याएं और बाधाएं उत्पन्न होंगी।



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