वास्तु शास्त्र की भूमिका

वास्तु शास्त्र की भूमिका  

वास्तु शास्त्र की भूमिका ओम प्रकाश दार्शनिक आज मानवीय सृष्टि में जो कुछ भी और जैसे भी हो रहा है, वह यदि अवांछित ढंग से न होकर विधि सापेक्ष रूप में हो तो निश्चित ही बहुत से अमंगल टल सकते हैं। वास्तुशास्त्र इस मांगल्य की स्थापना में हमारा सहायक अथवा मार्गदर्शक हो सकता है। भली-भांति हम इससे परिचित हैं कि मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। गांधी जी कहा करते थे ‘‘मनुष्य मेरा प्रथम विचार हैं और इसके भी आगे बढ़कर स्वामी विवेकानंद ने इस आनंद संदेश की घोषणा की। ‘‘श्रृणयन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा’’ हे अमृत पुत्रगण ! कैसा मधुर और दिव्य संबोधन है यह। इसलिए भाषा, संस्कृति, सभ्यता देश या राष्ट्र का भेद होने पर भी मानव जाति एक है तथा मानव एक है। मानव के विचार अथवा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उछाल है, वह जातिगत अथवा देशगत नहीं सारे विश्व का तथा मानव मात्र का है। इसलिए ‘‘वैश्विक शिवत्य’’ की दिव्य एवं उछाल भावना से ओत-प्रोत होकर भारतीय ऋतम्भरा की वाणी है। ‘‘कृण्वंतो विश्वमायेम्’’ पाश्चात्य जगत में ‘‘विज्ञान’’ शब्द का जिस तरह व्यापक अर्थ में प्रयोग होता है, वैसे ही भारत में ‘‘शास्त्र’’ शब्द अधिक व्याप्त व सारगर्भित है। मानव जीवन के लिए जितने भी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान आवश्यक हैं, जितनी दिशाओं में कर्मशक्ति का विस्तार आवश्यक है, सभी का सम्यक और परिपूर्ण विचार भारतीय शास्त्रों में किया गया है। वास्तुशास्त्र इसी लोक कल्याणकारी भाव से उदभूत ज्ञान की अमूल्य धरोहर है। सृष्टि रचना के संदर्भ में सृष्टि का आदि धारक तथा पोषक तत्व वैदिक भाषा में ऋतु है, जो एक स्वयं प्रकाश्य पवित्र नियम है। वही मानो मंगलमयी चेतना को स्पन्दित करता है, भौतिक जगत को संचालित करता है तथा आध्यात्मिकता के मूल में स्थित परम सत्य है। अतएव सृष्टि के समस्त अंग तथा सूर्य, चंद्र, पृथ्वी आदि का पशु, पक्षी और मानव के साथ अन्योन्याश्रित संबंध है। उनके एक अंग में परिवर्तन होगा तो वह अन्य अंगों को प्रभावित करेगा। आज पर्यावरण प्रदूषण प्रकृति के असंतुलित शोषण का ही परिणाम है। पंच महाभूत मानव शरीर इस सृष्टि के ही अंगभूत पंच तत्वों यथा पृथ्वी, जल आकाश, अग्नि और वायु से निर्मित है। इन्हीं से आजीवन उसमें वृद्धि और पुष्टि होती है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है। ‘‘छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।। (मानस 4-112) मनुष्य के संपूर्ण जीवन में ये पंच महाभूत नैसर्गिक ऊर्जाओं के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। हम इस धरा पर कहीं भी निवास करें, अपनी जीवन शैली को इन पंच तत्वों व नैसर्गिक ऊर्जाओं के अनुरूप ढालना अनिवार्य है। इसी में अंतर्निहित है, वैश्विक मांगल्य में वास्तुशास्त्र की भूमिका। प्रकृति के प्रति पूज्य भाव तभी तो हमारे ऋषियों ने प्रातः स्मरण का विधान बना कर प्रतिदिन प्रकृति नमन का संस्कार हमको प्रदत किया हैः- ‘‘पृथ्वी सगन्धासर सास्तधापः स्पर्शी च वायुज्र्वेलिनं च तेजः । नमः सशब्दं महत्ता सदैव, कुर्बन्तु सर्वे मम् सुप्रभातम्।।’’ (वामन पुराण 14-27) पृथ्वी माता है तथा हम उसके पुत्र हैं ‘‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृश्त्यिाः’’ इस भाव को नित्य नूतन व चिरंतन बनाये रखने के लिए हमारी प्रातः प्रार्थनाः ‘‘समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मण्डले विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शम् क्षमस्य मेंः’’ के अनुसार वास्तुशास्त्रीय नियमन की शिवत्व का पोषक संस्कार है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत (11-2-41) में कहा है: ‘‘रवं वायुभग्नि सलिल यही ब ओतीषि सत्यानिदिशो दुयादीन। सरति समुद्वाश्च हरेः शरीरं यात्किचं भूतं प्रणभेदषन्यः वास्तुशास्त्र की व्यापकता पृथ्वी के दोनों ध्रुवों के मध्य चुंबकीय बल रेखाएं है जो मानव शरीर पर स्पष्ट प्रभाव डालती है तथा धरती के ही विभिन्न स्थल है, जो मन पर अपना सूक्ष्म प्रभाव डालते हैं, इन्हीं सब प्रभावों को पहचान कर उनके उचित अनुस्थापन का नाम है वास्तुशास्त्र। इसीलिए विश्वकर्मा ने कहा है:- ‘‘वास्तुशास्त्र के वैज्ञानिक एवं तकनीकी सिद्धांत केवल आवासीय सीमा तक ही प्रभावशाली नहीं है वरन इनका उपयोग औद्योगिक विकास व नगर तथा ग्राम नियोजन के रूप में भी समस्त मानव जाति के भौतिक तथ आध्यात्मिक कल्याण के लिए है।’’ वैश्विक संदर्भ में आज विश्व में अशांति मानव जीवन के हर क्षेत्र में अत्यंत तीव्र गति से व्याप्त हो रही है। आज मानव जिस भौतिकवादी वैज्ञानिक प्रगति से आशा लगाये बैठा है कि वह सुख, शांति, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करेगी, वही इस विश्व के समस्त वैभव, सौंदर्य और मानव संस्कृति को ही समूल नष्ट करने का कारण बन रही है। पश्चिमी अवधारणा इस विनाश के मूल में है- पश्चिमी अवधारणा जिसके अनुसार मनुष्य सारी सृष्टि से अलग है और अपनी इच्छानुसार ढालने, शोषण व दिशा देने की शक्ति और अधिकार उसे प्राप्त है। अनोल्ड टायनबी इस अवधारणा को ही आज के पर्यावरण -विनाश तथा मानव-जीवन में अशांति को सर्वाधिक दोषी मानते हैं। Û पाश्चात्य विकास की वीभत्सता स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका प्रवास के समय भगिति निवेदिता से कहा था, ‘‘पश्चिम की जीवन यात्रा एक अट्टहास है, किंतु उसके पीछे रुदन है और रुदन में ही उसकी परिसमाप्ति होगी।’’ आज समृद्धि के शिखर पर पहुंच कर भी यही सत्य दिखाई दे रहा है कि वे राष्ट्र नैतिक तथा समाजिक मूल्यों के संकट का सामना कर रहे हैं। एकांकीपन, परिवारों की टूटन, मद्य और मादक द्रव्यों की दासता, हत्या, यौन अपराध, तलाक, आतंकवाद, आत्म-हत्या, कौमार्य अवस्था में गर्भ-धारण आदि की समस्याएं सारे पश्चिमी समाजों के लिए अभिशाप बनी हुई है। क्या इसे संतुष्ट, सुखी समाज का मांगल्य चित्रण की संज्ञा दी जा सकती है। आधार भूतियां भारतीय जीवन पद्धति में धर्म, संस्कृति, विज्ञान और जीवन चारांे क्षेत्रों का विस्तार समान है और उसका दृष्टिकोण समन्वय प्रधान है। सृष्टि के साथ अविरोध भाव प्राप्त करने की पद्धति समन्वय है जिसके परिणाम है- सद्भावना, सद्व्यवहार और सत्-प्रेम जिनका प्रभाव मानव जीवन पर ही नहीं वरन प्रकृति एवं पंच तत्वों पर भी व्यापक रूप में पड़ता है। क्योंकि ये पंचतत्व भी उतने ही संवेदनशील चेतन और जागरूक हैं जितने कि हम जीवधारी मनुष्य। मानव जीवन शैली व पंच तत्वों के साथ सामंजस्य व समन्वय ही वैदिक वास्तुशास्त्र का आधार है, जो वैश्विक शिवत्व का सूत्रधार भी है। Û दिशाएं: हमारे ऋषियों ने दस दिशाएं बताई है, प्रत्येक दिशाओं के साथ देवताओं का संबंध है। पाश्चात्य भूगोल विज्ञान केवल चार दिशाएं मानता है। पूर्वोभिमुख बैठकर पढ़ने या कार्य करने से बौद्धिक शक्ति व विचार चेतना का स्फुरण विशेष रूप से होता है। Û पृथ्वी: भूमि का ढलान पूर्व एवं उत्तर की ओर है जो कि श्रेष्ठ स्थिति है क्योंकि पूर्व में उदय होने वाले सूर्य की रश्मियों का लाभ भवन में मिलेगा, एवं उत्तरीय ध्रुव से प्रभावित होने वाली चुंबकीय तरंगों का प्रवाह निरंतर बना रहेगा। Û जल: यदि उपयोग में आने वाला स्वच्छ जल दिन में सूर्य की किरण् ाों से प्रभावित होता है तथा रात्रि में चंद्रमा की किरणों से प्रभावित होता है तो इस तरह के जल के उपयोग से निरोगता प्राप्त होती है। अतः पानी का स्त्रोत ईशान में हो तो बल, बुद्धि व तेजस्वितावर्धक स्थिति बनती है। ण् अग्नि तत्व: विश्व में अग्नि तत्व अन्य सब तत्वों को प्रभावित करता है। अग्नि तत्व ही आदि तत्व है। इसका स्थान आग्नेय में है। अतः अग्नि तत्व के कार्य आग्नेय दिशा में ही संपादित करना शुभ है। अन्यथा प्रतिकूल प्रभाव होता है। ण् वायु: भवन में निरंतर शुद्ध वायु (प्राण वायु) का प्रवाह बना रहे, इस तरह की भवन निर्माण योजना आवश्यक है। वायव्य दिशा वायु तत्व का स्थान है। पवन-पुत्र हनुमान की भी जगह है, अतएव वायव्य दिशा में ही बच्चों का शयन कक्ष रखा जाता है, ताकि बच्चे संस्कारयुक्त हों। Û यह तो सर्वमान्य परंपरा है कि उत्तर की ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए। इसका कारण यह है कि मानव मस्तिष्क भी उत्तर ध्रुव का प्रतिरूप है। अतएव उत्तर की ओर सिर करके सोने से रक्त में विकर्षण होता है। परिणामस्वरूप मानसिक संतुलन, अनेक समस्याओं को जन्म देता है। ण् उच्च ईशान के कारण बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है, जिससे निरंतर आर्थिक हानि की स्थिति बनती है। ईशान को अत्यधिक भारयुक्त कर देने से आकस्मिक दुर्घटनाओं तथा मानसिक चिंताकारक योग बनता है। इतना ही नहीं ईशान कोण में शयन कक्ष होने से अपंग व शारीरिक विकृति वाले बालकों का जन्म होता है। ण् वास्तु के अनुरूप आंतरिक गृह सज्जा भी मानव मस्तिष्क पर मनोवैज्ञानिक असर करती है। चित्र चरित्र का निर्माण करते हैं। शांति, पवित्रता और प्रेरणा देने वाले प्रकृति चित्र, देवताओं अथवा महापुरुषों के चित्रों से ही घर को सुसज्जित करना चाहिए। सत-साहित्य को घर में स्थान मिलना चाहिए रंगों का समायोजन भी सौम्य व सात्विक होना चाहिए। अतः सौम्य-सुखद संवेदनाओं के साथ घर का वातावरण अनुकूल व सुख-समृद्धिमय, मंगल-भवन, अमंगलहारी बनाने के लिए वास्तु कला के नियमों का पालन हितकर होगा। यहीं से शिवत्व का प्रस्फुटन होगा। परंतु आज इनका परिवारों में विश्व व्यापकता का अभाव होता जा रहा है। परिणामस्वरूप कामुक हिंसक अनैतिक संस्कारों की बढ़ोत्तरी परिवार जीवन के लिए अभिशाप सिद्ध हो रही है। कारण श्रेष्ठ विचार और भाव आयुवर्धक अथवा अमृत प्रद्याता है। मानव-हृदय में जैसे विचार और भाव उत्पन्न होते हैं, वैसे ही संस्कार उसके मन पर अंकित होते हैं। Û सत्यम-शिवम सुंदरम: - वास्तु शास्त्र के सिद्धांत सरल व सहज रूप में ग्रहण किये जाने योग्य हैं। संतुलित अनुपात का ध्यान रखें बिना जो वास्तु रचना की जाती है, वह मानव हृदय एवं आत्मा को नहीं रुचिकर लगती है। जीवन में संयम और संतुलन नहीं रहता है, जिसके अभाव में जीवन सुनियोजित नहीं बन पाता है। इस प्रकार से सुख-शांति व सुरक्षा के साथ मानवीय सुकोमल संवेदनाओं के आंचल में पल्लवित व विकसित हो रही सात्विक समाज रचना में वास्तु-शास्त्र की भूमिका अप्रतिम है। Û फलितायें विभिन्न देशों की भौगोलिक स्थिति पर वास्तुशास्त्री दृष्टि ण् जापान यानि छोटा सा देश पर आर्थिक एवम् तकनीकी प्रगति में सब से आगे है, कारण है कि जापान के ईशान में सबसे गहरा समुद्र प्रशांत महासागर और दूसरी और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा व द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर आणविक आक्रमण का कारण बना है। जापान के आग्नेय कोण में भी पानी यानि समुद्र का होना। ण् इसी तरह ब्रिटेन के ईशान में नार्वेजियन सागर जो उत्तर के आर्कटिक महासागर से घिरा है और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से इस भौगोलिक स्थिति की अनुकूलता के कारण ही ब्रिटेन प्रभुता संपन्न राष्ट्र बन सका है। ण् अफ्रीका की प्रगति इसलिए रुकी है क्योंकि उसका ईशान भाग ही कटा हुआ है। जो कि वास्तु-दोष से परिपूर्ण है। फलस्वरूप संपन्नता का अभाव-अकाल, खूनी संघर्ष की स्थिति। ण् हमारे भारत देश में भी अनेक साम्राज्यों का उत्थान और पतन हुआ है। विगत पंद्रह सौ वर्षों से युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता व झंझावतो के थपेड़े लगते रहे हैं। उसका मुख्य कारण पश्चिम, दक्षिण व आग्नेय तीनदिशाओं में समुद्र से घिरा रहना। मध्य भारत के बाद दक्षिण व आग्नेय तीनों दिशाओं में समुद्र से घिरा रहना। इसके बाद दक्षिण की ओर भू-भाग का कम होना भी वास्तु अनुकूलता के प्रभाव को कम करता है। लेकिन भारत की भूमि का पूर्व की ओर ढलान तथा ईशान में हिमाच्छादित हिमशिलाओं की उपस्थिति वास्तु-प्रभाव को दृढ़ता प्रदान करता है। यही देश को एक विशिष्ट स्थिति में ले जाता है।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2011

वास्तु शास्त्र भारत की एक प्राचीन गूढ विद्या है। वास्तु शास्त्र का आधार मानव जीवन में संतुलन का प्रतिपादन करना है। वास्तु का मूलभूत सिद्धांत प्रकृति के सूक्ष्म एवं स्थूल प्रभावों को मानव मात्र के अनुरूप प्रयोग में लाना है।

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