आवश्यकता है शोध की

आवश्यकता है शोध की  

पिछले कुछ दषकों सेे काल सर्प योग धूमकेतु के समान भारतीय फलित ज्योतिष पर छाया हुआ है। इस योग का जनमानस पर इतना अधिक प्रभाव हुआ है कि अल्पज्ञ, या अर्ध शिक्षित ज्योतिषी भी इसके लक्षण, उपलक्षण, फलित तथा अनिष्ट और अरिष्ट फलों का बखान अधिकाधिक रूप से कर बैठते हैं। परंतु बात जब योग की शास्त्रीयता की हो, तो वे कुछ भी बताने में असमर्थ हो जाते हैं। काल सर्प योग का कोई शास्त्रीय आधार उपलब्ध नहीं है। फलित ज्योतिष के किसी भी ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं मिलता कि इस योग का प्रवर्तन किस आचार्य ने किया। वराह मिहिर, पाराषर, वैद्यनाथ, मंत्रेष्वर, मणित्थ, कल्याण वर्मा और नरसिंह दैवज्ञ ने क्यों इस योग की चर्चा नहीं की? भटोत्पल्ल जैसे विज्ञ टीकाकारों ने अपनी टीका में इस योग का उल्लेख तक नही किया। कतिपय फलित ग्रंथों, यथा सारावली, बृहज्जातक, पराषर होरा षास्त्रम आदि में वर्णित सर्प योग, नाग योग, सर्प वेष्ठित योग आदि योगों का वर्तमान में प्रचलित काल सर्प योग से न तो योग रचना, अथवा ग्रह स्थिति के स्तर पर साम्य है और न फलित के स्तर पर। षतमंजरी राजयोग नामक ग्रंथ में तो ‘नाग योग’ का फल अत्यंत षुभ कहा गया है। ज्योतिष विज्ञान में नवीन षोध, नवीन चिंतन तथा अध्ययन प्रतिबंधित नही है। समय के साथ-साथ नवीन अभिगम सामने आते हैं। प्राचीन सिद्धंातों की महत्ता तथा स्वीकार्यता में संषोधन आवष्यक हो जाता है। काल सर्प योग का प्रादुर्भाव इसी प्रकार के चिंतन-मनन से हुआ है तथा इस योग से पीड़ित सैकड़ांे-हजारों व्यक्तियों की कुंड़लियां तथा उन्हंे मिलने वाले अरिष्ट फल इसके प्रमाण हैं। ज्योतिष विज्ञान में निरंतर चिंतन-मनन हांे, वह आधुनिक युग में काल-धर्म के अनुसार सभी के लिए हितकारी हो तथा उसमें सामाजिक हित के लिए अनुसंधान हो, इसपर किसी को आपत्ति हो ही नही सकती। परंतु काल सर्प योग के समस्त जातकांे का अरिष्ट हो, यह भी व्यावहारिक रूप में देखने में नहीं आता। अतः यह समझना आवष्यक है कि किस प्रकार संसार के कई महानतम पुरुष, अपनी कुंडलियों में अरिष्टकारक काल सर्प योग कि उपस्थिति के बावजूद, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहे। कहीं ऐसा तो नहीं कि काल सर्प योग विषयक मूल अवधारणा ही दोषपूर्ण हो तथा फलित ज्योतिष के स्थापित नियमों की अवेलहना हो रही हो? फलित ग्रंथों में वर्णित ज्योतिषीय योगों की रचना के 4 मूलभूत नियम हैं। पहले नियम के अंतर्गत योगंांे का निर्माण ग्रहों के परस्पर संबंधों के आधार पर, दूसरे प्रकार से ग्रहों की सापेक्ष स्थिति के आधार पर, तीसरे प्रकार से कुंडली में स्थित ग्रहों का किसी आकृति विषेष से साम्य होने पर तथा चतुर्थ प्रकार से योगों की रचना ग्रहों की राषि विषिष्ट में स्थिति के आधार पर होती है. काल सर्प योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार सूर्य से षनि तक सातों ग्रहों का राहु तथा केतु के मध्य आने पर काल सर्प योग होता है। ज्योतिषीय योगों में इस प्रकार से किन्ही 2 ग्रहों के मध्य ग्रह आने की स्थिति को कर्तरी कहा जाता है। यदि कर्तरी षुभ ग्रहों की हो, तो षुभ कर्तरी, अन्यथा पाप ग्रहों से कर्तरी होने पर पाप कर्तरी योग होता है। नाम के अनुरूप ही इनका फल भी होता है। परंतु यह कर्तरी योग किसी एक भाव के दोनों ओर ग्रह होने पर होता है और किसी एक ग्रह के लिए ही होता है। उदाहरण के लिए यदि लग्नेष के दोनों ओर पाप ग्रह हांे, तो कहा जाता है कि लग्नेष पाप कर्तरी में है। सूर्य से षनि तक 7 ग्रहों की कर्तरी किसी भी फलित ज्योतिष के ग्रंथ में देखने में नही आती। मानसागरी के चतुर्थ अध्याय के ष्लोक 27 में 2 ग्रहों-गुरु तथा षनि के मध्य अन्य ग्रहों की स्थिति से राजयोग कहा गया है। परंतु राहु-केतु के काल सर्प योग तथा गुरु-षनि के मध्य ग्रह होने की स्थिति में कितना अंतर है, यह पाठक स्वयं देखें। मानसागरी का ष्लोक है: आदौ जीवः षनिर्नांते ग्रहा मध्ये निरंतरम्। राजयोगं विजानीयात् कुटुंबबलमुत्तमम्।। अर्थात गुरु लग्न भाव में हो तथा षनि व्यय भाव में हो और गुरु तथा षनि के मध्य अन्य ग्रह हांे, तो राजयोग होता है। इस योग में जातक को कुटुंब से बहुत बल मिलता है। यह योग भाव विषेष पर आधारित है। इस योग में समस्त ग्रहों की स्थिति लग्न तथा द्वादष भाव के मध्य वांछित है, किसी भी भाव से किसी भी भाव तक नहीं। यदि तर्क के लिए मान लिया जाए कि काल सर्प योग में पाप ग्रहों राहु तथा केतु की कर्तरी के मध्य 5 भावों तथा 7 ग्रहों के आ जाने से जातक को कष्टदायक फलों की अनुभूति होगी और उसका जीवन कष्टमय होगा, तो क्या नैसर्गिक पाप ग्रहों मंगल तथा षनि के मध्य अन्य सभी ग्रह आ जाने पर कष्टप्रद फलों की अनुभूति नहीं होगी? किसी भी सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए नियमों में एकरूपता तथा उनमंे स्थायित्व आवष्यक है। लगभग 3790 वर्ष पूर्व श्री बलभद्र मिश्र ने होरा रत्न की रचना की थी। यह फलित का प्रतिष्ठित ग्रंथ है। ग्रंथकार ने इसके अध्याय 5 में राजयोगांे का वर्णन करते समय राहु से होने वाले राजयोग का भी वर्णन किया है। यहां प्रसंगवश ग्रंथ के कुछ श्लोक उद्धरणस्वरूप प्रस्तुत हैं, जिनमें तथाकथित पूर्ण काल सर्प योग बना हुआ है। यदि जन्म समय में लग्न में बुध से युत चंद्रमा उच्च राषि में, दषम में षनि, दूसरे भाव में राहु, ग्यारहवें भाव में गुरु, बारहवें में सूर्य ,दसवें भाव में मंगल तथा षुक्र दसवें, अथवा ग्यारहवें भाव में से किसी एक में हो, तो जातक, मदमस्त हाथियों की सेना से युक्त, राजा होता है। इस ष्लोक में बतायी गयी ग्रह स्थिति के अनुसार द्वितीय भाव में स्थित राहु तथा अष्टम भाव में स्थित केतु के मध्य अवस्थित ग्रह हैं। द्वितीय भाव में स्थित राहु का भाव फल अरिष्टकारक होता है। फिर भी राजयोग है। बलभद्र मिश्र ने काल सर्प योग, अथवा किसी अरिष्ट फल का किंचित भी उल्लेख नहीं किया है और यही क्यों? इसी ग्रंथ के इसी अध्याय के 18वें ष्लोक में बतायी गयी ग्रह स्थिति भी पंचम भाव के राहु से काल सर्प योग बना रही है। परंतु बलभद्र मिश्र के अनुसार यह भी राजयोग की स्थिति है। जन्म समय में कुंभ लग्न में गुरु,दूसरे भाव में षुक्र, तीसरे में सूर्य ,बारहवें में मंगल, चतुर्थ भाव में चंद्रमा से युक्त बुध तथा पंचम भाव में राहु हो, तो जातक नृप समुदाय में इंद्र के समान राजा होता है। लग्न भाव, नवम भाव, दषम भाव आदि अन्य भावों में राहु की स्थिति से भी राजयोग होने के उदाहरण उपलब्ध हैं। फलित ज्योतिष के मानक ग्रंथों के अनुसार किसी भी ग्रह की अपनी राषि में, अपनी मूल त्रिकोण राषि में, अपनी उच्च राषि में स्थिति ग्रह के षुभत्व में वृद्धि करती है। राहु-केतु की स्वराषि, मूल त्रिकोण राषि ,उच्च राषि के विषय में ज्योतिष ग्रंथों में विभिन्न मत उपलब्ध हैं। यहां पर यह उल्लेख आवश्यक है कि काल सर्प योग में राहु भले ही अपनी राषि में हो, अपनी मूल त्रिकोण राषि में हो, या अपनी उच्च राषि में हो, उसका अषुभ फल ही निर्धारित किया गया है। यह, अपवाद न हो कर, ज्योतिष षास्त्र के आधारभूत नियमों की स्पष्ट अवहेलना प्रतीत होती है। त्रिषड़ाय भावों में स्थित राहु को सभी ग्रंथकारों ने प्रषस्त कहा है। इन भावों में स्थित राहु से राजयोगों का होना षास्त्रसम्मत है। यदि त्रिषडाय भावों में स्थित राहु पर षुभ ग्रहों की दृष्टि हो, तो वह स्वयं अरिष्टकारक नहीं रहता, बल्कि अरिष्टों को दूर करने वाला ग्रह हो जाता है। मानसागरी में कहा गया है कि यदि राहु तीसरे, छठे, अथवा ग्यारहवें भाव में हो तथा उसपर किसी ग्रह की षुभ दृष्टि हो, तो वह सभी दोषांे को उसी प्रकार हर लेता है, जिस प्रकार पवन रुई को उड़ा देता है। तब क्या त्रिषडाय भावों में स्थित राहु पर किसी षुभ ग्रह, यथा गुरु, षुक्र, अथवा बुध की दृष्टि के बावजूद जातक काल सर्प दोष से पीड़ित होगा? राहु तथा केतु छाया ग्रह हैं। ये दिखाई नहीं देते हैं। इनका पिंड नहीं है। लघु पाराषरी में इनके फल के विषय में कहा गया है: ‘यद् यद् भावगतौ वापि यदृ यद् भावेष संयुतौ’। ये दोनों ग्रह जिस भाव में स्थित हों, अथवा जिस ग्रह के साथ स्थित हों, उसी के अनुरूप फल देते हैं। बहुप्रचलित एवं स्वीकार्य कृष्णा मूर्ति पद्धति में राहु-केतु के फलों के विषय में कहा गया है कि ये दोनों ग्रह जिस ग्रह के साथ युति में हों, उसका, जिस नक्षत्र में स्थित हांे, उस नक्षत्र स्वामी का, जिस राषि में हांे, उस राषि स्वामी का फल देते हंै। साथ ही यदि कोई ग्रह इन दोनों छाया ग्रहों पर दृष्टिपात कर रहा हो, तो दृष्ट ग्रह के अनुसार फल देते हंै। स्पष्ट है कि प्राचीन, अथवा अर्वाचीन किसी भी आचार्य ने राहु-केतु को स्वतंत्र फल देने वाले ग्रह नहीं माना है। इनके फल दूसरे ग्रहों पर आश्रित हंै। अतः काल सर्प योग के रूप में इन दोनों ग्रहों के स्वतंत्र फल देने की क्षमता पर प्रष्न चिह्न लग जाता है। इस संदर्भ में फलित ज्योतिष का एक और सर्वमान्य सिद्धांत उल्लेखनीय है। किसी भी कुंडली का षुभत्व, या अषुभत्व किसी एक योग के नहीं, वर्न उसमें स्थित ग्रहों की स्थिति तथा समस्त योगों के वषीभूत होता है। दर्जनों ऐसी कुंडलियां हैं, जिनमें राजयोग स्पष्ट है। काल सर्प योग भी नहीं है, फिर भी जातक साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उन्हें राजयोग का लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है। इन सब योगों के फलीभूत न होने की पृष्ठभूमि में योगों का भंग होना प्रमुख कारण होता है। राजयोगों का भंग होना, ग्रहों का नीचत्व भंग हो कर राजयोग होना, अरिष्ट भंग होना आदि के योग ज्योतिष ग्रंथों में उपलब्ध हैं। परंतु काल सर्प योग कैसे भंग होता है, इसपर कहीं कोई योग उपलब्ध नहीं है। तथाकथित काल सर्प योग की सैंकड़ों कंुडलियां हैं, जिनके जातक, सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए, जीवन में महानतम उपलब्धियंा प्राप्त कर सके हैं। उनपर काल सर्प योग का दुष्प्रभाव नहीं हुआ। अतः सिद्धांत रूप से काल सर्प योग अभिगम अपूर्ण है। ग्रह गणितानुसार राहु तथा केतु सदैव एक दूसरे से 180 अंषों के अंतर पर रहते हैं। दोनों एक दूसरे से सातवें भाव में रहते हैं। इन 7 भावों में, राहु एवं केतु सहित, 7 ग्रहों की स्थिति के कारण, किसी न किसी भाव में 2, या 2 से अधिक ग्रहों की युति होना अवष्यंभावी है। इस युति में केंदे्रष-त्रिकोणेष की युति होगी, तो राजयोग होगा। राहु-केतु केंद्र-त्रिकोण स्थान में स्थित हो कर योगकारी होते हैं। इस अवस्था में राहु-केतु की किसी कंेदे्रष-त्रिकोणेष से युति मणि कांचन योग होगी। जैमिनि सूत्रम् 3 -1-7 में महर्षि जैमिनि ने आत्मकारक ग्रह की केतु, षुक्र तथा मंगल के साथ युति को राजयेागकारक बताया है। ऐसी अवस्था में राहु पर्यंत 5 ग्रह होने पर कंुडली में काल सर्प योग होगा तथा उसके दुष्परिणामों से जातक का पीड़ित होना चिंता का विषय हो जाएगा। राहु तथा केतु के मध्य अन्य सभी ग्रहों का आ जाना सामान्य घटना है। इसी वर्ष मई मास में 18 मई से 28 मई तक, जून मास में 13 जून से 24 जून तक, जुलाई मास में 10 जुलाई से 22 जुलाई के मध्य पूर्ण काल सर्प योग है। इन मासों में तथा इसके पूर्व और पष्चात् भी आंषिक काल सर्प योग की स्थिति बनती है। इस अवधि में जन्मे सभी जातकों को अरिष्ट फल प्राप्त होंगे तथा उनका जीवन कष्टमय होगा, यह आवश्यक नहीं। जिस प्रकार की भ्रमपूर्ण स्थिति काल सर्प योग की है, वैसी ही भ्रमपूर्ण स्थिति काल सर्प षांति के लिए किये जा रहे उपायों की है। कुछ वर्ष पूर्व तक काल सर्प षांति नाग पंचमी के दिन की जाती थी। अब किसी भी मास की पंचमी के दिन काल सर्प ष्ंााति के अनुष्ठान, बिना किसी षास्त्रीय आधार के, किये जा रहे हैं। काल सर्प षांति के विधानों में इतना अधिक अंतर है कि देख कर आष्चर्य होता है। किसी भी ग्रह की अरिष्ट षांति के लिए धर्म षास्त्रों में स्पष्ट विधान है कि संबंधित ग्रह के अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता की पूजा-अर्चना की जाए। काल सर्प योग की षांति के लिए किये जा रहे विधानों में नाग पूजन किया जाता है, राहु तथा केतु के अधिदेवता, प्रत्यधिदेवता की पूजा नहीं। अतः तथाकथित विधान भी षास्त्रसम्मत नहीं है। काल सर्प योग से ग्रसित किसी एक जातक को षुभ फल प्राप्त होना तथा किसी दूसरे को अषुभ फल प्राप्त होना अध्ययन का विषय है। लगभग 100 ऐसे जातकों की कुंडलियों के अध्ययन तथा विष्लेषण से पता चला कि उन्होंने अपने जीवन में सर्वोत्तम सफलता प्राप्त की और उच्च पद पर आसीन रहे तथा उनका जीवन प्रेरणास्पद रहा। इन जातकों की कुंडलियों के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि इन जातकों की कुंडलियों में मंगल अथवा षनि का संबंध नवम भाव से था। ये दोनों ग्रह, अथवा इनमें से कोई एक भी ग्रह स्वयं नवम भाव में स्थित था। एक मत है कि नवम भाव से मंगल तथा षनि का संबंध जातक को ऊर्जावान बनाता है; कुछ कर दिखाने का, काम में जुटे रहने का जुनून देता है। अतः जातक अपने प्रयासों तथा परिश्रम से जीवन में निष्चित सफलता प्राप्त करता है। लग्न भाव का स्वामी अर्थात लग्नेष मंगल, अथवा षनि में से कोई एक ग्रह था। यह केवल मेष, वृष्चिक ,मकर तथा कुंभ लग्न की कुडलियों में ही सभंव है। जिन कंुडलियों में यह स्थिति नही ंथी, उनमें मंगल एवं षनि का लग्नेष से संबंध था। मंगल एवं षनि जिन राषियों में स्थित थे उनके स्वामियों में परस्पर केंद्र, अथवा व्यत्यय संबंध था।


उच्च फलादेश तकनीक विशेषांक  जुलाई 2007

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