पद, उपपद और अर्गला के आधार पर फल कथन

पद, उपपद और अर्गला के आधार पर फल कथन  

लग्नकुंडली के आधार पर की गई भविष्यवाणी मिथ्या हो जाती है, जिसके निराकरण हेतु महर्षि पराशर ने षड्वर्ग की व्यवस्था की। जब कोई फल लग्नकुंडली के साथ-साथ षड्वर्ग कुंडली से भी प्रकट होता है, तो उसके मिथ्या होने की संभावना कम होती है और वह समय की कसौटी पर खरा उतरता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु जैमिनि और पराशर दोनों महर्षियों ने अपने ग्रंथों में पद, उपपद, अर्गला और कारकांश जैसे विषयों का समावेश किया है। इन तथ्यों के आधार पर फल कथन का प्रचलन उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में अधिक है। जैमिनि सूत्रम में श्लोक 30,31 और 32 पद को परिभाषित करते हैं - यावदीशाश्रयं पद मृज्ञाणाम्।।30।। स्वस्थे दाराः ।।31।। सुतस्थे जन्म ।।32।। श्लोक 30 के अनुसार विचारणीय भाव से उसके स्वामी ग्रह तक गिनकर जो संख्या हो, उतनी ही संख्या उस स्वामी ग्रह से गिनकर जो राशि आती है, वही विचारणीय राशि का पद होती है। इसेे आरूढ़ भी कहते हैं। श्लोक 31 और 32 के अनुसार इस नियम के कुछ अपवाद हैं यदि जैसे यदि विचारणीय भाव से उसका स्वामी चतुर्थ स्थान पर हो, तो यही स्थान उस भाव का पद होगा। स्वस्थः = चतुर्थ स्थान, दाराः = चतुर्थ स्थान मेव पदं भवति। इसी प्रकार यदि विचारणीय भाव से उसका स्वामी सप्तम स्थान पर हो, तो विचारणीय भाव से दशम स्थान उस भाव का पद होगा। लग्न के पद को लग्नपद या लग्नारूढ और द्वादश भाव के पद को उपपद या उपारूढ कहते है। लग्नपद को मुख्य पद और अन्य भावों के पदों को क्रमशः धनपद, सहजपद, सुखपद, पुत्रपद आदि कहते है। महर्षि पराशर के अनुसारः स्वस्थानं सप्तम् नैव पदं भवितुमर्हति। तस्मिन पदत्वे सम्प्राप्ति मध्यंतुर्य क्रमात् पदम्।। बृहत् पराशर होराशास्त्र, अध्याय 27, श्लोक 4 यदि किसी भाव का स्वामी स्वस्थान में हो, तो उक्त नियम के विपरीत उस भाव से दशम स्थानगत राशि उस भाव की पद राशि होगी। इसी प्रकार यदि विचारणीय भाव से सप्तम स्थान पर भावेश है, तो वह भाव स्वयं ही पद होना चाहिए। किंतु, ऐसा नहीं है। इसके अपवाद स्वरूप इस स्थान से चतुर्थ स्थान पद होगा। अतः स्वस्थान और सप्तम स्थान पद नहीं होते, बल्कि उनके स्थान पर क्रमशः दशम और चतुर्थ स्थान पद होते हैं। अर्गला क्या है? विचारणीय भाव से दूसरे, चैथे, पांचवें या 11वें स्थान में ग्रह स्थित होने पर भाव अर्गला से युक्त होता है। यदि विचारणीय भाव से 12वें, 10वें, नौवें या तीसरे स्थान में ग्रह हो, तो भाव अर्गला से बाधित होता है। इस कथन का तात्पर्य यह है कि भाव दो का अर्गला बाधित स्थान 12वां, भाव चार का 10वां, भाव पांच का नौ और भाव 11 का बाधित स्थान तीसरा है। यदि भाव 12, 10, नौ और तीन ग्रह रहित हों तो शुभ अर्गला बनती है, जो अत्यधिक लाभ की सूचक है। राहु और केतु के लिए अर्गला स्थान नौ और बाधक स्थान पांच होता है। अर्गला से युक्त भाव के फल को स्थिरता प्राप्त होती है, इसलिए वह फल निश्चित रूप से फलित होता है। यदि बाधक स्थान तीन में तीन या अधिक पाप ग्रह हों, तो यह स्थान बाधक नहीं होता। इसे विपरीत अर्गला कहते हैं। यह एक प्रकार से विपरीत राजयोग के समान है। अर्गला स्थान 2 4 5 11 बाधक स्थान 12 10 9 3 पराशर के अनुसार राशियों की तरह ग्रहों के भी पद होते हैं। यस्माद्यावतिथे राशौ खेटात् तद्भवनं द्विज। ततस्तावतिथं राशिं खेटारूढं़ प्रचक्षते।। द्विनाथ द्विभयोरेवं व्यवस्था सबलावधि। विगणय्य पदं विप्र ततस्तस्य फलं वदेत्।। बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 27, श्लोक 5,6 विचारणीय ग्रह से उसकी राशि तक की संख्या गिनों। तत्पश्चात उस राशि से उतनी ही संख्या आगे गिनकर पर जो स्थान आएगा उसमें स्थित राशि उस ग्रह का पद होता है। सूर्य और चंद्र को छोड़कर अन्य ग्रहों की दो-दो राशियां होती हैं। ऐसी अवस्था में बलवान राशि तक गणना करके पद का निर्धारण करना चाहिए। बलवान राशि कौन सी होगी,? जैमिनि के अनुसार ग्रह रहित राशि की तुलना में ग्रह युक्त राशि अधिक बली, कम ग्रह वाली राशि से अधिक ग्रहों वाली राशि अधिक बली और समान ग्रह होने पर स्व, उच्च या शुभ ग्रह वाली राशि अधिक बली होती है। जैसे किसी कर्क लग्न की कुंडली में सूर्य मेंष राशिस्थ है। मंगल का पद अर्थात आरूढ़ ज्ञात करना है। मंगल की दो राशियों मेष और वृश्चिक में सूर्य के अधिष्ठित होने के कारण मेष बलवान है। मंगल से मेष तक की गिनती संख्या चार है, इसलिए मेष से आगे चार संख्या गिनने पर लग्न भावगत कर्क राशि मंगल की पद राशि होगी। पद, उपपद और अर्गला से फल कथन भाव 2, 5, 9, 11 या किसी केंद्र भाव का पद लग्नपद से यदि केंद्र या त्रिकोण स्थान में हो, शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और पाप ग्रहों से मुक्त हो, तो जातक का जीवन उन्नतिशील होता है। ऐसे लोगों को कोई अदृश्य शक्ति अतिरिक्त बल प्रदान करती है, जिससे वे उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रापत करके अपने परिश्रम, दूरदर्शिता और तेजोबल से अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। निर्बल लग्नपद के मनुष्य अयोग्य, अक्षम, अशिक्षित, अज्ञानी, अस्थिर व मंद बुद्धि के, शिथिल, उत्साहहीन, अदूरदर्शी और उद्देश्यहीन होते हैं। यदि केंद्र-त्रिकोण भाव अर्गला से युक्त हों, तो व्यक्ति भाग्यवान, राजसम्मान और अनेक क्षेत्रों में लाभ अर्जित करने वाला होता है। इसके विपरीत भाव 6, 8, और 12 अर्गला से युक्त हों तो अशुभ फल प्राप्त होते हैं। जैसे षष्ठ भाव की अर्गला से शत्रु भय, अष्टम भाव की अर्गला से दैहिक कष्ट और द्वादश भाव की अर्गला से अपव्यय होता है। जैमिनि सूत्रम, अध्याय 1, श्लोक 22 और 23 के अनुसार यदि लग्नपद और उससे सप्तम स्थान की शुभ ग्रहों से युक्त अर्गला बाधित भी हो, तो धन-धान्य की वृद्धि होती है। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवाणी, धीरूभाई अंबानी, अमत्र्य सेन, हरिवंश राय बच्चन जैसे महापुरुषों के लग्नपद केंद्र -त्रिकोण जैसे शुभ स्थानों में हैं और लग्नकुंडली के अनेक भाव अर्गला से युक्त हैं। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों में बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व के स्वामी रहे हैं। लग्नपद से एकादश स्थान: लग्न कुंडली से सभी भावों के पद ज्ञात करके एक पद कुंडली बना लें। एकादश स्थान लाभ का होता है, इसलिए लग्नपद से एकादश स्थान में कोई भी ग्रह हो या उस पर किसी ग्रह की दृष्टि हो, तो मनुष्य का जीवन उन्नतिशील, कर्मशील, यश, धन और संपत्ति से युक्त होता है। यदि इस स्थान पर शुभ ग्रहों की दृष्टि या स्थिति हो, तो प्रशंसनीय कार्यों से उन्नति होती है और यदि अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो निंदनीय कार्यों से जीवन स्तर उच्च होता है। यदि एकादश भाव अर्गला से युक्त भी हो, तो और अधिक लाभ होता है। लग्नपद से द्वितीय और सप्तम स्थान: इन स्थानों में शुभ ग्रह चंद्रमा, बृहस्पति या शुक्र हो या कोई स्वोच्च पाप ग्रह हो, तो व्यक्ति यश, धन, पद और संपत्ति से सुखी होता है। बुध होने से प्रशासनिक पद की संभावना होती है और शुक्र होने से व्यक्ति, भोगी और साहित्य प्रेमी होता है। लग्नपद से द्वितीय स्थान में केतु होता हो तो बुढ़ापे के लक्षण शीघ्र उत्पन्न हो जाते हैं और सप्तम स्थान में राहु या केतु से उदर रोग होने की संभावना होती है। लग्नपद से सप्तम भाव का पद केंद्र या त्रिकोण स्थान में हो, तो जातक लक्ष्मीवान होता है और यदि छठे, आठवें, 12वें स्थान पर हो तो दरिद्र होता है। लग्नपद से द्वादश स्थान: यह व्यय का स्थान है जिस पर ग्रहों की दृष्टि या स्थिति होने पर व्यय अधिक होता है। यदि द्वादश की तुलना में एकादश भाव पर अधिक ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यय कम और लाभ अधिक होता है। द्वादश स्थान पर पाप ग्रहों के प्रभाव से अशुभ कार्यों में धन नष्ट होता है और शुभ ग्रहों के प्रभाव से शुभ कार्यों जैसे विवाह, मकान, शिक्षा, वाहन आदि पर व्यय होता है। जैमिनि सूत्रम् अध्याय 1, पाद 3, श्लोक 7 तथा बृहत् पराशर होराशास्त्र के अध्याय 27 श्लोक 16 के अनुसार लग्नपद से द्वादश स्थान में सूर्य, शुक्र और राहु एकत्र हों, तो सरकार के कारण धन हानि होती है और यदि इस स्थान को चंद्रमा देखे, तो निश्चित रूप से सरकार के कारण ही धन हानि होती है। धन और व्यापार योग: व्यापारियों की कुंडली में लग्न, धन, भाग्य और कर्म भाव तथा इनके स्वामी पुष्ट और बलवान होने चाहिए। व्यापार जगत में धन की भूमिका अहम् होती है, इसलिए धन से संबंधित भाव, भावेश और कारक ग्रहों का आपसी तालमेल और उनकी का अवस्था बलवान होना बहुत आवश्यक है। इनकी निर्बल अवस्था वालों को व्यापार नहीं बल्कि नौकरी करनी चाहिए, अन्यथा धन-व्यापार के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है। धीरूभाई अंबानी की कुंडली एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने अपना जीवन शून्य से शुरू करके 1 लाख करोड़ का व्यापारिक साम्राज्य स्थापित किया। उपर्युक्त नियमों के अनुसार उनकी लग्न कुंडली को पद कुंडली में परिवर्तित करने पर ज्ञात होता है कि लग्नपद और सुखपद दोनों केंद्र भावगत शुभ मिथुन राशि में और भाग्यपद लग्नपद से एकादश स्थान (लग्न से त्रिकोण स्थान) पर है, इन पर किसी भी पाप ग्रह की दृष्टि नहीं है। लग्नकुंडली में लग्न, पंचम, नवम और दशम भाव अर्गला से युक्त हैं। अतः ऐसे ग्रह योग की प्रेरणा से धीरू भाई आत्मबली, मानसिक बली, उत्साही, कर्मठ और दृढ़ संकल्प से परिपूर्ण व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनकी पदकुंडली में धन पद की स्थिति लग्नपद से पंचम और कर्मपद की स्थिति कर्म भाव से पंचम स्थान पर है। यह उन्नति, सफलता, संपन्नता और व्यापार जगत में विश्वसनीयता हेतु एक प्रबल योग है। उनकी कुंडली में पद लग्न से व्यय पद द्वादश स्थान पर है और दो शुभ ग्रह बुध एवं शुक्र से दृष्ट है। इससे प्रकट होता है कि धीरू भाई के धन का व्यय शुभ कार्यों में हुआ। अपने व्यापार के प्रसार हेतु उन्होंनंे बहुत धन का व्यय किया, जिससे इतना अधिक लाभ हुआ कि उनकी कंपनी के शेयर धारक उनके प्रति अत्यंत आदर की भावना रखते हैं। राजयोग: लग्न कुंडली में दशम भाव, सूर्य, चंद्र और बृहस्पति तथा उपचय भाव 3, 10 और 11 में स्थित मंगल, शनि और राहु शासन से संबंधित ग्रह हैं। पद कुंडली में जब लग्नपद, भाग्यपद और कर्मपद केंद्र, त्रिकोण या उपचय भाव (षष्ठ को छोड़कर) में उपस्थित हो, तो राजयोग होता है। पं. जवाहरलाल नेहरू की कुंडली में लग्नपद दशम भावगत है और तीन शुभ ग्रहों बुध, शुक्र एवं बृहस्पति से दृष्ट है। इंदिरा जी का लग्नपद भी दशम भाव में है, जो शनि से दृष्ट है। इन दोनों को तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो ज्ञात होता है कि पं. नेहरू बहुत अधिक भावुक, संवेदनशील, कल्पनाशील, दूरदर्शी, मानवतावादी और राष्ट्रवादी चिंतक तथा ईमानदारी और नैतिकता से परिपूर्ण बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे। इसी प्रकार नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमात्र्य सेन का लग्नपद सप्तम भाव में है और शुक्र से दृष्ट है। इन सभी के भाग्यपद और कर्मपद शुभ राशि या शुभ स्थान में स्थित हैं। विश्लेषण हेतु राष्ट्रपति डाॅ. अब्दुल कलाम की कुंडली एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। उनका जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ और अभावों से ग्रस्त होने के कारण अपने बाल्यकाल में रेलवे स्टेशन पर अखबार बेचकर अपना गुजारा किया। ऐसे व्यक्ति का विद्वान सभी विषयों का ज्ञाता तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण अन्वेषण कार्यों में निपुण एवं राष्ट्रपति जैसे उच्च राजकीय पद पर आसीन होना एक करिश्माई उपलब्धि है। इसके पीछे कौन सी गुह्य शक्ति है ? लग्नपद उपचय स्थान 3 में है। लग्नपद से कर्मपद पंचम स्थान और भाग्यपद नवम स्थान (दोनों त्रिकोण) में है। लग्नपद से 11वें स्थान में शनि ग्रह है, जिस पर शुभ ग्रह बृहस्पति की दृष्टि है। उच्च शिक्षा के लिए पंचम भाव, पंचमेश, बुध और बृहस्पति का बलवान होना आवश्यक है। पंचमेश मंगल की स्वगृह पर दृष्टि, स्वगृही बुध (भद्र और बुध-आदित्य योग), उच्च राशिस्थ बृहस्पति आदि उच्च शिक्षा का संकेत दे रहे है। पदकुंडली में प्रज्ञापद अर्थात पंचम भाव का पद अपने स्थान से दशम स्थान अर्थात् लग्न से द्वितीय भाव पर पड़ता है, जिस पर बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि है। इसके साथ-साथ पंचम भाव से चतुर्थ स्थान पर शुभ ग्रह बृहस्पति होने के कारण यह भाव शुभ अर्गला से युक्त है। इसका बाधक दशम स्थान ग्रह राहित है। अतः उच्च शिक्षा एवं उससे प्राप्त उपलब्धियों के उत्कृष्ट फल निश्चित हैं। राज्यकारक दशम भाव का पद लग्नपद से पंचम स्थान पर और दशम भाव से दशम होने के कारण प्रबल राजयोग बन गया है। दशम भाव से दूसरे, चैथे और 11वें स्थानों में ग्रह उपस्थित होने के कारण यह भाव अर्गला युक्त है। अतः राजयोग का फल राष्ट्रपति के पद के रूप में फलीभूत हो गया है। लग्नदारपदे विप्रमिथः केन्द्रगते यदि। त्रिलाभयोस्त्रिकोणे वा सदा राजा धराधिपः।।33।। बृहत् पराशर होराशास्त्र यदि लग्नपद और स्त्रीपद परस्पर केंद्र-त्रिकोण में हों या तीसरे अथवा 11 वें स्थान पर हों, तो जातक राजा होता है। धीरूभाई और डाॅ. कलाम की पद कुंडली में लग्नपद और स्त्रीपद का संबंध क्रमशः 3-11 और त्रिकोण का है। बेनजीर भुट्टो की लग्न कुंडली में सप्तम भावगत सूर्य और मंगल तथा दशम भावगत शनि राजयोग का निर्माण कर रहे हैं। साथ ही दशम भाव से द्वितीय स्थान में ग्रह होने के कारण राज्य स्थान अर्गला से युक्त है। क्षितीय का बाधक स्थान द्वादश है, जिसमें कोई ग्रह नहीं है। अतः यह अर्गला बाधक रहित है। पद कुंडली में लग्नपद और कर्मपद शुभ ग्रह की राशि में हैं। इसके फलस्वरुप उन्हें प्रधानमंत्री का पद मिला, किंतु यह अस्थाई और विवादग्रस्त सिद्ध हुआ। क्यों? लग्नपद से कर्मपद अर्थात् राज्यपद अष्टम स्थान में है, लग्नपद से एकादश स्थान पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है और राज्यपद से एकादश स्थान पर पाप ग्रह शनि की दृष्टि है। श्रीमती भुट्टो को अपने पद से हटना ही नहीं पड़ा, अपितु अपना वतन भी छोड़ना पड़ा। वैवाहिक सुख: लग्नपद से सप्तम भाव का पद केंद्र, त्रिकोण और उपचय स्थान तीन,10,11 में हो, पति/पत्नी में मित्रता होती है और गृहस्थ जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है, किंतु यदि सप्तम भाव का पद छठे,आठवें,12वें में हो, तो उनमें मतैक्य नहीं होता, जिससे वैवाहिक जीवन में नीरसता, शुष्कता और शिथिलता उत्पन्न हो जाती है। बृहत् पराशर होराशास्त्र के अध्याय 28, श्लोक 3, 4 और 9 के अनुसार यदि उपपद किसी शुभ ग्रह की राशि में हो या शुभ ग्रह से युक्त यर दृष्ट हो, तो मनुष्य स्त्री-संतान का सुख भोगता है। किंतु, यदि उपपद पाप ग्रह की राशि में हो और पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो स्त्री-संतान के सुख का अभाव मिलता है। इसी प्रकार उपपद से द्वितीय स्थान में शुभ राशि, शुभ ग्रह की दृष्टि या उपस्थिति हो, तो उपर्युक्त सुख मिलता है, अन्यथा वह सुख नहीं मिलता। अतः स्त्री-संतान के सुख हेतु द्वितीय भाव की शुभता का बहुत महत्व है। डाॅ. कलाम स्त्री-संतान के सुख से वंचित हैं क्योंकि उनकी पद कुंडली में उपपद शुभ ग्रह की राशि कन्या में तो है, मगर शनि की दृष्टि और छाया ग्रहों के प्रभाव से तथा उपपद से द्वितीय स्थान मंगल से पीड़ित है। उपारूढे द्वितीये वा मिथुने संस्थिते सति। तत्र जातनरो विप्र बहुदारयुतो भवेत्।।10।। बृहत् पराशर होरा, अध्याय 28 यदि उपपद में या उपपद से द्वितीय स्थान में मिथुन राशि हो, तो व्यक्ति अनेक स्त्रियों का भोग करता है (और स्त्री अनेक पुरुषों का भोग करती है)। एक युवती की कुंडली में लग्नपद से सप्तम भाव का पद षष्ठ स्थान पर होने से और मंगल, राहु व शनि की मिश्रित दृष्टि होने से पति से शत्रुता का भाव प्रकट होता है। इसका उपपद मिथुन राशि में है। इस युवती ने अपने विवाह के कुछ महीनों के बाद पति को छोड़ कर किसी अन्य पुरुष के संग अनैतिक संबंध कायम कर लिए थे। लगभग 6 वर्षों तक ऐसे अनैतिक संबंधों के बाद अब उसने अपने से कम उम्र के एक युवक से विवाह किया है। अभिनेत्री रेखा की कुंडली में लग्न भावगत मंगल-राहु योग शनि की दृष्टि से बहुत विषाक्त हो गया है, जिसके विध्वंसक प्रभाव से सप्तम भाव प्रदत्त सुख नष्ट हो गए हैं। द्वादश भावगत शुक्र अत्यधिक काम पिपासा का प्रतीक है। उनके जीवन में अनेक पुरुष आये, मगर किसी के साथ भी उनके दांपत्य जीवन को स्थायित्व नहीं मिला। इसकी पुष्टि पद कुंडली से होती है, जिसमें उपपद पाप ग्रह की राशि में उच्च ग्रहाश्रित है। तत्र पापस्य पापयोगे प्रवज्या दारनाशो वा।।2।। शुभदृग्योगात्र।।4।। उच्चे बहुदारः।।6।। जैमिनि सूत्र, अध्याय 1, पाद 4 यदि उपपद पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो या पाप ग्रह की राशि में हो, तो जातक संयासी या पति/पत्नी से रहित होता है। ऐसा होने पर यदि उपपद शुभ ग्रह से दृष्ट हो, तो पूर्वोक्त पति/पत्नी का नाश नहीं होता। यदि उपपद उच्च ग्रहाश्रित हो तो अनेक स्त्रियां/पुरूष होते हैं।“ बेनजीर भुट्टो का दांपत्य जीवन अनेक वर्षों तक शुष्क रहा और उन्हें अकेले ही विदेश में निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। उनके प्रति आसिफ जरदारी भ्रष्टाचार के आरोप में लगभग आठ सालों तक जेल में कैद रहे। इस प्रकार उनके यौवन का स्वर्णिम काल नष्ट हो चुका है। उनकी पद कुंडली में उपपद पाप राशि में है और पाप ग्रह मंगल तथा शुभ ग्रह गुरु से दृष्ट है। अतः कुछ वर्षों के कष्टों के बाद मुक्ति मिलने की संभावना है। करिश्मा कपूर का विवाह बड़ी धूमधाम से 29 सितंबर, 2003 को हुआ और 9 मई, 2005 को उन्होंने पुत्री को जन्म दिया। तभी से वह अपने पति से अलग हैं और तलाक के लिए कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। लग्न कुंडली में द्वादश भावगत सूर्य-शनि दांपत्य जीवन के सुखों के नाशक हैं। पद कुंडली में सप्तम भाव का पद राहु अधिष्ठित पाप राशि वृश्चिक में स्थित है और मंगल से दृष्ट है तथा उपपद भी पाप राशि मेष और पाप ग्रह मंगल के संग है। अतः दांपत्य सुखों का नाश होना ही था। सप्तम भाव से चैथे और पांचवें स्थानों में ग्रह होने से अर्गला बनती है, जो बाधक रहित है क्योंकि बाधक स्थान क्रमशः 10 और 9 ग्रह रहित हैं। अतः पति से समझौता करना उनके लिए लाभकारी होगा, अन्यथा तलाक के बाद द्वितीय विवाह कर लेना चाहिए।


फलादेश तकनीक विशेषांक  अकतूबर 2005

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