जीवन रक्षक महामृत्युंजय मंत्र

जीवन रक्षक महामृत्युंजय मंत्र  

सूक्ष्म और रहस्यमय परंतु उपयोगी शब्द खंडों और अक्षरों के समूह को ‘‘मंत्र’’ कहते हैं। वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि कुछ खास शब्दों या मंत्रों के उच्चारण से ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं और इन ध्वनियों या नाद से एक विषेष प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है जो मनुष्य के मस्तिष्क को तथा वातावरण को प्रभावित करती है। ऐसा ही एक जीवन रक्षक मंत्र है - महामृत्युंजय मंत्र। यह मंत्र, जो ऋग्वेद व यजुर्वेद में भी लिखित है, भगवान षिव अर्थात मृत्युंजय को समर्पित है। ”¬ त्र्यंबकम यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्’’ इसके अतिरिक्त यह मंत्र अन्य दो नामों से भी जाना जाता है - 1. ‘रुद्र मंत्र’ जो कि भगवान षिव का रौद्र रूप है. 2. ‘त्र्यंबकम् मंत्र’ जो भगवान षिव की तीसरी आंख से संबंधित है। यह मृत्यु पर विजय पाने वाला मंत्र है। इसमें 13 प्रमुख ‘षब्द’, 8 प्रमुख ‘वाक्य’, 14 प्रमुख ‘पद’ और 4 ‘चरण’ हैं। मंत्र का मूल अर्थ: समस्त संसार के पालनहार, तीन नेत्रों वाले षिव, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, की हम आराधना करते हैं। विष्व में सुरभि फैलाने वाले, मृत्यु से परे भगवान षिव से हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें ताकि हमें मोक्ष की प्राप्ति हो सके जैसे ककड़ी का पौधा अपने फल को पकने तक लता के बंधन में बांधे रखता है और पक जाने पर मुक्त कर देता है। विभिन्न नाम व स्वरूप: 52 वर्ण व 6 प्रणव (¬) युक्त मंत्र को ‘मृत-संजीवनी मंत्र’ कहा जाता है क्योंकि यह मृत व्यक्ति को ‘पुनर्जीवन’ देने की प्रक्रिया में काम आता है। दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने इसी मंत्र को सिद्ध किया था। यह मंत्र ही अधिक प्रचलित है। ¬ हौं जूं सः, ¬ भूर्भुवः स्वः, ¬ त्र्यंबकम् यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ¬ स्वः भुवः भूः, ¬ सः जूं हौं ¬ Û 48 वर्ण व 8 प्रणव युक्त मंत्र ‘मृत्युंजय मंत्र’ कहलाता है- ¬ भूः ¬ भुवः ¬ स्वः ¬ त्र्यंबकम् यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ¬ स्वः ¬ भुवः ¬ भूः ¬ Û 62 वर्ण व 14 प्रणव युक्त मंत्र ‘महामृत्युंजय मंत्र’ कहलाता हैं- ‘‘¬ हौं ¬ जूं ¬ सः, ¬ भू ¬ भुवः ¬ स्वः, ¬ त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ¬ स्वः ¬ भुवः ¬ भूः ¬ सः ¬ जूं ¬ हौं ¬’’ 13 शब्दों के अर्थ: 1. ¬: सर्वषक्तिमान प्रभु 2. त्र्यंबकम् ः तीन नेत्रों वाले, सत्व, रज व तम तीनों गुणों के महेष्वर भगवान षिव। 3. यजामहे ः हम यजन, आराधना, प्रार्थना, सम्मान करते हैं 4. सुगन्धिम ः जीवन में सुरभि फैलाने वाले 5. पुष्टि ः पूर्ण व समृद्ध जीवन शक्ति दाता 6. वर्धनम ः पालनहार, जीवनपोषक, शक्तिसंपन्न 7. ऊर्वारुकम ः ककड़ी का पौधा, जीवन के बंधन 8. इव ः जैसे 9. बंधनान ः बंधन, रोगायुक्त आकर्षण 10. मृत्योर ः मृत्यु से 11. मुक्षीय ः मुक्ति दें, आजाद करें 12. मा ः नहीं 13. अमृतात् ः मोक्ष 8 वाक्यों के चक्राधारित अर्थ: 1. त्र्यंबकम् ः भूत शक्ति, भवेष, मूलाधार चक्र में स्थित 2. यजामहे ः षर्वाणी शक्ति, सर्वेष, स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित 3. सुगन्धिम ः विरूपा शक्ति, रुद्रेष, मणिपुर चक्र में स्थित 4. पुष्टिवर्धनम ः वंषवर्धिनी शक्ति, पुरुषवरदेष, अनाहत चक्र में स्थित 5. उर्वारुकमिव ः उग्रा शक्ति, उग्रेष, विषुद्ध चक्र में स्थित 6. बंधनान ः मानवती शक्ति, महादेवेष, आज्ञा चक्र में स्थित 7. मृत्योर्मुक्षीय ः भद्रकाली शक्ति, भीमेष, सहस्रदल चक्र में स्थित 8. मामृतात् ः ईषानी शक्ति, ईषानेष, सहस्रदल चक्र में स्थित 14 पदों के अर्थ: 1. त्र्यंबकम् ः त्रैलोक्य शक्ति, त्रिपुरा नरेष, सिर में स्थित 2. यजा ः सुगंधा शक्ति, यज्ञवतीष, ललाट में स्थित 3. महे ः माया शक्ति, महत्तवेष, कानों में स्थित 4. सुगन्धिम ः सुगंधि शक्ति, सुगंधीष, नासिका में स्थित 5. पुष्टि ः पुरंदरी शक्ति, पुरुषेष, मुख में स्थित 6. वर्धनम ः वंषकरी शक्ति, वरेष, कंठ में स्थित 7. उर्वा ः ऊध्र्वेष शक्ति, उमापतीष, हृदय में स्थित 8. रुक ः रुक्मवती शक्ति, रूपवतीष, कटि में स्थित 9. मिव ः मित्रादित्य शक्ति, नाभि में स्थित 10. बन्धनान ः बर्बरी शक्ति, बालचंद्रमौलीष, गुह्य में स्थित 11. मृत्यो ः मंत्रवती शक्ति, मंत्रेष, ऊरुद्वय में स्थित 12. मुक्षीय ः मुक्तिकरी शक्ति, मुक्तिकरीष, जानुद्वय में स्थित 13. मा ः महाषक्ति, महाकालेष, जंघाद्वय में स्थित 14. अमृतात ः अमृतवती शक्ति, अमृतेष, पादतल में स्थित 4 चरणों के अर्थ: 1. त्र्यंबकम् यजामहे ः अम्बिका शक्ति सहित त्र्यंबकेष, पूर्व दिषा में प्रवाहित शक्ति में स्थित 2. सुगन्धिम पुष्टिवर्धनम ः वामा शक्ति सहित मृत्युंजयेष, दक्षिण दिषा में प्रवाहित शक्ति में स्थित 3. उर्वारुकमिव बंधनान ः भीमा शक्ति सहित महादेवेष, पष्चिम दिषा में प्रवाहित शक्ति में स्थित 4. मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ः द्रौपदी शक्ति सहित संजीवनीष, उत्तर दिषा में प्रवाहित शक्ति में स्थित मंत्र लाभ: प्रत्येक व्यक्ति अपने जन्म दिवस पर सवा लाख मंत्रों का जप करे, हवन करे, अभिमंत्रित किया हुआ जल पिए, गरीबों, बीमारों व साधुओं को खाना खिलाए तो यह मंत्र लंबी आयु, स्वास्थ्य, आयु, शांति व समृद्धि देने में सक्षम है। 1. यह मंत्र स्वस्थ जीवन प्रदान करता है। 2. अकाल मृत्यु से रक्षा करता है। 3. अग्नि जल वाहनादि से होने वाली दुर्धटनाओं से बचाव करता है। 4. सर्प एवं बिच्छू के काटने पर भी अपना प्रभाव रखता है। 5. कठिन एवं असाध्य रोगों पर भी विजय प्राप्त करता है। 6. हर तरह की बीमारी को भगाने का शस्त्र है। 7. भगवान षिव का मोक्ष मंत्र होने के कारण दीर्घ आयु देता है। 8. शांति, ऐष्वर्य, पुष्टि, तुष्टि(संतुष्टि) और मोक्ष देता है। 9. कुंडली में नाड़ी दोष से मुक्ति देता है। 10. राष्ट्र पर विपत्ति से रक्षा करता है। ु

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ज्योतिष योग विशेषांक  जनवरी 2008

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