झूठ में जीते हैं लोग

झूठ में जीते हैं लोग  

जब कोई तुम्हें तुम्हारी आदतों से जगाता है तो और पीड़ा होती है। सुबह तुम बड़ी गहरी नींद में सो रहे हो, बड़े मजे के सपने देख रहे हो- और कोई हिलाने लगता है कि उठो! और यह भी हो सकता है कि रात तुम कहकर सोए होगे कि मुझे उठा देना, कि मुझे ट्रेन पकड़नी है, कि मुझे किसी काम पर जाना है। तुम्हारे ही कहने के कारण कोई आदमी तुम्हें सुबह उठा रहा हो, तो भी दुश्मन मालूम पड़ता है, तो भी लगता है कि यह दुष्ट कहां से आ गया, कि इसेे जरा भी अकल नहीं है, कि अभी एक करवट तो और ले लेने दे ! तुम खुद कहते हो, तो भी जगाने वाला दुश्मन मालूम पड़ता है। और संतों से तो तुमने कभी कहा नहीं कि जगाओ। और यह तुम्हारी नींद बड़ी पुरानी है और वे तुम्हें झकझोर डालते हैं। वे तुम्हें हिलाते हैं। वे कहते हैं - उठो ! वे तुम्हें चोट करते हैं। तुम मधुर सपना देख रहे थे। तुम महल देख रहे थे सोने का। तुम देख रहे थे सुंदर स्त्रियां। तुम देख रहे थे अप्सराएं। तुम स्वर्ग में विराजमान थे। तुम सिंहासन पर बैठे थे, देवी-देवता तुम्हारे चारों तरफ नाच रहे थे और तुम्हारे यशोगान कर रहे थे। और ये सज्जन आ गए और तुम्हें हिलाने लगे कि उठो कि यह सब सपना है, कि जागो! संत से तुम सदा नाराज होओगे। जो संत से राजी हो जाए, वह संत हो गया। ‘भगत देख राजी हुई, जगत देख रोई।’ मीरा कहती है- भगत देख राजी हुई। भगत देख जो राजी हो जाए, वह भगत। संत को देखकर जो राजी हो जाए, वह संत। संत बहुत नहीं है। तुम्हें अड़चनें हैं। तुम सत्य तो जानना ही नहीं चाहते, क्योंकि तुम जीते झूठ में हो। फ्रैडरिक नीत्शे ने कहा है कि लोग मर जाएंगे, अगर उनके झूठ छीन लिए जाएं। लोग झूठों के सहारे जीते हैं। झूठों से उनकी जिंदगी में चिकनाई बनी रहती है, लुब्रीकेंट है झूठ। कोई स्त्री तुमसे कह देती है- ‘तुमसे सुंदर पुरुष कोई भी नहीं!’ अब यह सरासर झूठ है। इतनी बड़ी पृथ्वी पर तुमसे सुंदर कोई पुरुष नहीं! और इस स्त्री ने न जाने ऐसे कितने पुरुष हैं, कोई परीक्षा हुई है? कोई ओलंपिक हुआ है? कोई चुनाव हुआ है, कहीं तय हुआ है कि कौन आदमी सबसे ज्यादा सुंदर है? नहीं, लेकिन तुम भी फिक्र नहीं करते, हालांकि तुम भी जानते हो कि यह सरासर झूठ है। मगर यह झूठ मानने-जैसा लगता है। तुम किसी स्त्री से कहते हो कि ‘तुझसे मुझे जितना प्रेम है, किसी से न कभी था न कभी होगा। और जनम-जनम यह टिकेगा, यह अमर है।’ यह झूठ इसलिए है कि यही बात तुम और स्त्रियों से भी पहले कह चुके हो। और झूठ इसलिए है कि यही बात बहुत संभव है कि तुम और स्त्रियों से आगे भी कहोगे। और झूठ इसलिए है कि यही बात और पुरुषों ने भी इस स्त्री से पहले भी कही है, तब भी इसने माना था, और झूठ इसलिए है कि क्षणभंगुर मन से शाश्वत प्रेम हो कैसे सकेगा? मन ही क्षणभंगुर है। आज जो स्त्री सुंदर लग रही है, कल हो सकता है दो कौड़ी की मालूम होने लगे। अकसर ऐसा हो जाता है, स्त्री मिल जाए तो दो कौड़ी की हो जाती है, न मिले तो प्रेम कायम रहता है। धन्यभागी थे मजनू कि स्त्री नहीं मिली, मिल जाती तो सिर फोड़ते। कहीं बैठे बाजार में चना बेचते होते। बाल-बच्चे पालते। नहीं मिली, तो ‘लैला-लैला’ चिल्ला रहे हैं। एक आदमी एक पागलखाने में गया। उसने एक कोठरी में एक आदमी को सिर पीटते देखा। और एक तसवीर हाथ में लिए छाती से लगा, आंखों से आंसुओं की जलधार बह रही है। तो पूछा उस आदमी ने कि इस पागल को क्या हुआ है? उसने कहा कि देखते नहीं वह तसवीर! इस स्त्री के पीछे दीवाना था। वह इसे मिली नहीं। बात समझ में आ गई कि रो रहा है, दुःखी हो रहा है। इसी के पीछे पागल हो गया। उसके सामने की कोठरी में एक दूसरा आदमी था। वह अपने कपड़े फाड़ रहा था और दीवारों में घूंसे मार रहा था और सिर पटक रहा था जमीन पर और बाल नोच रहा था। पूछा- ‘इसको क्या हो गया?’ उसने कहा- ‘अब इसकी मत पूछो। जो स्त्री उसको नहीं मिली, वह इसको मिल गई। यह उस स्त्री के मिलने की वजह से पागल हो गया।’ जो आज इस क्षण में लगता है, वह एक क्षण बाद टिकेगा? जो इस क्षण की प्रतीति है, वह इस क्षण की प्रतीति है, वह कल के क्षण में भी होगी, पक्का नहीं है। मगर आदमी झूठ पसंद करता है। झूठ प्यारे लगते हैं। झूठ में खुशामद है। झूठ फुसलाते हैं। सच में चोट होती है। यूनान के बहुत बड़े विचारक प्लेटो ने अपने भविष्य के राज्य में कवियों को प्रवेश नहीं दिया है। उसने आयोजना की है कि उसने रिपब्लिक में, उसका जो भविष्य का कल्पना का राज्य है, उसका जो रामराज्य है, उसमें कवियों को कोई जगह नहीं होगी। कवि बड़े नाराज थे। और लोगों ने पूछा भी प्लेटो से कि यह बात क्या है? कवियों से ऐसी क्या नाराजगी है? और सब होंगे, कवि क्यों नहीं होंगे? तो प्लेटो ने कहा: कवियों के कारण झूठ चलता है। और मेरे राज्य में झूठ नहीं चाहिए, सच चाहिए। अब और सपने नहीं, अब यथार्थ चाहिए। लेकिन प्लेटो का राज्य कभी बनेगा नहीं! नीत्शे ज्यादा सही बात कह रहा है कि लोग झूठ में ही जीते हैं, लोग झूठ नहीं छोड़ते। झूठ हट जाए तो उनकी गाड़ी ठहर जाए। झूठ हट जाए तो जीने-योग्य कारण ही न रह जाए। कोई इस झूठ में जीता है कि धन मिल जाएगा तो बड़ा सुख होगा। यह झूठ है। किसी को कभी धन मिलने से सुख नहीं हुआ। सारी बातें इस पक्ष में गवाही देती हैं कि किसी आदमी को धन मिलने से सुख नहीं हुआ। मगर फिर भी यह झूठ चलता है कि धन मिल जाएगा तो सुख होगा, पद मिल जाएगा तो सुख होगा। किसी को कभी नहीं मिला। मनुष्य जाति का पूरा इतिहास निरपवाद रूप से सिद्ध करता है कि पद मिलने से किसी को सुख नहीं मिला। अन्यथा बुद्ध सिंहासन छोड़कर क्यों जाते? नहीं तो महावीर राजमहल छोड़, जंगलों में क्यों भटकते?


ग्रह शांति एवं उपाय विशेषांक  सितम्बर 2010

ज्योतिष में विभिन्न उपायों का फल, लाल किताब के उपाय, व्यवहारिक उपाय, उपायों का उद्देश्य, औषधि स्नान व रत्नों का प्रयोग इत्यादि सभी विषयों की सांगोपांग जानकारी देने वाला यह विशेषांक प्रत्येक घर की आवश्यकता है। उपायों में मंत्र व उपासना के महत्व के अतिरिक्त यंत्र धारण/पूजन द्वारा ग्रह दोष निवारण की विधि भी स्पष्ट की गई है। ज्योतिष द्वारा भविष्यकथन में सहायता मिलती है परंतु इसका मूल उद्देश्य समस्याओं के सटीक समाधान जुटाना है। इस उद्देश्य की प्रतिपूर्ति करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह अंक विशेष उपयोगी है।

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