श्री गणेश जी के प्रमुख स्थल

श्री गणेश जी के प्रमुख स्थल  

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व्यूस : 2466 | सितम्बर 2013

पंचदेवों मे से एक, पार्वती-शिव के आत्मज, समस्त देवी-देवताओं में सर्वाग्रपूज्य और सनातन हिंदू धर्म-शास्त्रों एवं हिंदुओं के जन-जीवन में अत्यधिक परिव्याप्त भगवान श्री गणेश के सभी तीर्थ-स्थलों, मूर्तियों और क्षेत्रों आदि का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करना असंभव है। प्रायः समस्त श्री शक्ति-शिव मंदिरों में श्री गणेश के मंगल विग्रह प्रतिष्ठित हैं। अन्य देव स्थलों में भी भगवान श्री गणेश रक्षणार्थ विद्यमान हैं। कुछ स्थलों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:

महाराष्ट्र प्रदेश के गणपति

Û मुंबई के सिद्धि विनायक: मुंबई में भगवान गणपति के अनेक मंदिर हैं, और उनमें से दो बहुत पुराने हैं- प्रभादेवी का ‘सिद्धि विनायक मंदिर’ और मूल जी जेठा कापड़ मार्केट का सिद्धि विनायक मंदिर।

Û सतारा के ढोल्या गणपति: सतारा के समस्त मांगलिक कार्य ढोल्या गणपति को अक्षत चढ़ाने के उपरांत ही आरंभ होते हैं। मंदिर अति प्राचीन है एवं मूर्ति स्वयंभू और वृहदाकार है।

Û नासिक के मोदकेश्वर: नासिक के इस गणेश मंदिर की प्रतिमा के मोदकाकार होने की वजह से ये ‘मोदकेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हैं। यह मंदिर हिगल्याका गणपति मंदिर कहलाता है जिसकी गणना छप्पन विनायकों में होती है। यह ‘कामवरद महोत्कट क्षेत्र’ है।

Û थेऊर के चिंतामणि: अष्ट-गणपति का यह क्षेत्र थेऊर पूना जिले में पूना से 25 कि.मी. की दूरी पर है। यहां के भगवान गणपति चिंतामणि कहलाते हैं जिनकी स्थापना उनके परम शिरोमणि भक्त मोरया गोसावी ने की थी।

Û चिंचवड़ के ‘मंगलमूर्ति’: महाराष्ट्र प्रांत के पूना जिले से करीब 15 कि.मी. दूरस्थ इस जागृत देव-स्थान पर गणेश जी ‘मंगलमूर्ति’ के नाम से विख्यात हैं।

Û राजणगांव के महागणपति: अष्ट-विनायक का यह क्षेत्र राजणगांव पूना जिले में पूना से लगभग 55 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां के भगवान गणपति का श्री विग्रह ‘महागणपति’ के नाम से विख्यात है।

Û मोरगांव के मयूरेश्वर: यह अष्ट विनायक क्षेत्र महाराष्ट्र प्रांत में ही है। यहां के देवता हैं भगवान मयूरेश्वर। पूना जिले से लगभग सŸार किलोमीटर की दूरी पर मोरगांव क्षेत्र में गणेश भक्त शिरोमणि मोरया गोसावी ने इस मंदिनर की स्थापना की।

Û लेह्याद्रि के गिरिजात्म: यह अष्ट विनायक क्षेत्र पूना से लगभग 100 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। गणेश पुराणोक्त यह तीर्थ ‘गिरिजात्मज’ के नाम से मशहूर है।

Û ओझर के विघ्नेश्वर: अष्ट विनायक का यह क्षेत्र बड़ा ही रमणीक है। यह स्थान लेह्याद्रि के समीप ही है। यहां के भगवान गणेश विघ्नेश्वर कहलाते हैं। मंदिर बहुत ही भव्य एवं सुंदर है। प्रतिमा बायीं सूंड़ वाली है। इनकी बहुत प्रतिष्ठा है।

Û महड़ के वरद विनायक: यह क्षेत्र कुलाबा जिले में है। भगवान गणपति का यह तीर्थ स्थल महड़ महाराष्ट्र के अष्ट विनायकों में बहुत विख्यात है।

Û पाली के बल्लालेश्वर: यह सिद्ध क्षेत्र भी महाराष्ट्र प्रांत के कुलाबा जिले में पाली नामक स्थान में है। यहां के भगवान गणेश का नाम बल्लालेश्वर है। यह एक पुरातन गणपति तीर्थ स्थल है।

Û चिंतामणि गणेश (कलम्ब): इस स्थान का प्राचीन नाम ‘कदम्बपुर’ था। यह चिंतामणि क्षेत्र है। कहते हैं कि गौतम ऋषि के श्राप से त्राण पाने के लिए इस स्थान पर देवराज इंद्र ने श्री चिंतामणि गणेश की स्थापना कर उनकी पूजा आराधना की थी, इसलिए ये भगवान चिंतामणि गणेश कहलाते हैं।

Û सिद्धटेक (बोरीवली-मुुंबई): बोरीवली स्थित भगवान गणपति के इस प्रमुख तीर्थ-स्थान का प्राचीन नाम ‘सिद्धाश्रम’ है जो अब सिद्धटेक के नाम से जाना जाता है।

मध्य-प्रदेश के गणपति-स्थल

Û जबलपुर के श्री सिद्ध गणेश जी: यह एक नवीन सिद्ध गणपति स्थल है परंतु शीघ्र मनोकामना पूर्ति करने के कारण प्रसिद्ध हो चुका है। पुण्य सलिला मां नर्मदा के पावन तट पर ग्वारीघाट में रेलवे फाटक के पास 10 सितंबर 2002 के दिन भगवान गणपति के दिव्य विग्रह की स्थापना की गई है।

Û उज्जैन के बड़े गणेश जी: महाकाल के एक ओर भगवान गणपति, दूसरी और तीसरी ओर क्रमशः शिव पार्वती और कार्तिकेय स्वामी विराजमान हैं। मंदिर के समीप भगवान गणपति का मंदिर है जिसमें गणेश जी की एक आधुनिक मूर्ति है जो बहुत बड़ी व सुंदर है। यहां विभिन्न स्थानों पर षट् विनायक मंदिर भी है।

Û इन्दौर के विशाल गणपति: इन्दौर में भगवान गजानन की एक विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति तैलीय रंगों से रंगी होने के कारण बहुत सुहावनी लगती है। इस मूर्ति की ऊँचाई बारह फुट है।

Û ओंकारेश्वर के पंचमुख गणेश: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के महाकाल हैं तो दूसरे ओंकारेश्वर लिंग हैं। मंदिर के अहाते में ही भगवान गणपति का एक मंदिर है। मंदिर में पंचमुखी प्रथमेश्वर की प्रतिमा है।

Û ग्वालियर के विविध गणेश: ग्वालियर में भगवान गणेश के विविध मंदिर हैं जिनमें से कई प्रतिमाएं सिंदूर से सुशोभित हैं। ग्वालियर के चावड़ी बाजार मंदिर में स्थित गणेश प्रतिमा बहुत बड़ी है।

कर्नाटक के कुछ गणपति क्षेत्र

Û कुरुडमडे: कुरुडमडे के मंदिर की श्री सुब्रह्मण्यम की प्रतिमा हरे संगमरमर की है। मंदिर विजय नगर शासन काल का है।

Û इडगुंजी: यहां पर द्विभुजाधारी पंचखाद्यप्रिय भगवान महागणपति जी की मूर्ति है जो नागालंकार विभूषित है।

Û मंगलूर: मंगलूर के गणेश भगवान ‘शरऊ गणपति’ जागृत देवता के रूप में कर्नाटक व केरल में प्रसिद्ध हैं।

Û कोक्कड: कर्नाटक के कोक्कड ग्राम में भगवान गणेश की मूर्ति किसी मंदिर में नहीं है। कहते हैं कि भगवान गणेश ने स्वप्न में आकर मंदिर बनाने की मनाही कर दी थी। यहां पर एक मैदान में झाड़ के नीचे गणेश जी प्रतिष्ठित हैं।

आंध्र प्रदेश रेजंतल: भगवान गणपति का यह मंदिर पर्वत की गोद में बसा है। रेतंजल के सिद्ध विनायक महागणपति की बहुत ज्यादा मान्यता है। मदुरै के महागणपति इस स्थान के बारे में लगभग 825 वर्ष पूर्व की एक घटना का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि यहां पर किसी हरिजन महिला की दरांती मैदान में घास काटते वक्त किसी वस्तु से टकराई और वहां से खून की धार बहने लगी। लोगों ने जमीन खोदकर मूर्ति को बाहर निकाला तो भगवान गणेश की मूर्ति निकली जिसमें से रक्त निकल रहा था। तत्काल उसी जगह गर्भगृह बना दिया गया, भगवान की पूजा शुरू हो गई। भुवनेश्वर उड़ीसा के गणपति भुवनेश्वर के लगभग सभी शैव मंदिरों में भगवान शंकर या शिवलिंग के समीप गणेश जी की मूर्तियां हैं, किसी के साथ मूषक है तो कोई मूषक रहित है। किन्हीं के हाथों में कन्दमूल व मोदक हैं और किन्हीं के हाथों में मूलकंद-मोदक के साथ कुठार-अक्षमाला भी हैं।

कटक के महाविनायक: उड़ीसा के कटक जिले में भगवान विनायक का एक बहुत बड़ा शानदार मंदिर है।

श्री जगन्नाथपुरी

Û जगन्नाथपुरी में सिद्ध विनायक के भव्य मंदिर में गणेश जी की एक बहुत मनोरम आठ फुट ऊंची मूर्ति है।

Û पुरी के उŸार में सिद्ध हनुमान मंदिर में आद्य शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित पंच विनायक की भव्य प्रतिमा है जिसके पांच मस्तक हैं।

गुजरात के गणेश स्थल

सोमनाथ: द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक सोमनाथ के प्रसिद्ध प्राचाीन मंदिर के परिसर में अहिल्याबाई द्वारा निर्मित गणेश जी का एक मंदिर है।

बड़ौदा: बड़ौदा में सावरकर गणेश मंदिर और श्री ढुंढिराज गणेश मंदिर शिल्प कला की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं।

खंभात: यहां ब्राह्मणवाड़ा में श्री गणेश जी का स्वतंत्र मंदिर है, जहां श्री गणेश जी की मनुष्य के कद की भव्य प्रतिमा विराजित है।

धांगध्रा: यहां की सात फुट ऊंची एकदंत मूर्ति एक अखंड पत्थर मेंे उत्कीर्ण है। मंदिर जोगसर तालाब के एक किनारे पर है।

गोरज: यहां के सिद्धि विनायक की मूर्ति चतुर्भुज है। यह मंदिर एक शमी वृक्ष के नीचे अवस्थित है।

गोवा के प्रमुख गणपति स्थल

खांडोले: यहां के गणेश ‘खांडोल्यचा-गणपति’ कहलाते हैं। यहां का गणपति-मंदिर छोटा किंतु सुंदर है। यह पहाड़ के नीचे नारियल के झुरमुट में है, जिससे इनकी नैसर्गिक शोभा अप्रतिम है।

बांदिवडे़: यहां की श्री गोपाल-गणपति की मूर्ति जंगल में मिली थी। इसकी ऊंचाई एक फुट है।

द्रविड़ प्रदेश के मुख्य गणपति स्थल

परमक्कुडि: परमक्कुडि के समीप एक कांटेदार वृक्ष के नीचे गणपति अपने भाई स्कंद के साथ आसीन हैं। नव-दंपति अपने वैवाहिक जीवन की सफलता के लिए यहां आकर गणेश जी से प्रार्थना करते हैं और वे उसे पूर्ण भी करते हैं।

तिरुच्चेंट्टांगुडि: मायावरम-कराइकुडि लाइन पर मायावरम से 15 मील दूर नन्निलम के पास यह स्थान है। यहां का विनायक मंदिर विख्यात है।

तिरुनारैयूर: चिदम्बरम् के समीप तिरुनारैयूर में श्री गणेश जी का विशेष मंदिर है। इस मंदिर की गणेश मूर्ति को तमिल में ‘पोल्लेपिचिआयुर’ के नाम से पुकारते हैं।

कोट्टाइयूर: कराइकुडि के समीप एक विशेष विनायक हैं, जिनकी बड़ी अभ्यर्थना होती है।

तिरुप्पंरपयम: यह स्थान कुंभकोणम से 6 मील दूर है। यहां एक सरोवर के किनारे दक्षिणमूर्ति गणपति का मंदिर है। कहा जाता है कि इन्होंने जगत की प्रलय से रक्षा की थी।

तिरुवलम चुलि: यह क्षेत्र इक्कीस प्रधान गणपति क्षेत्रों में एक है। चोल देश में कुंभकोणम् के पास एक शिवालय है। यह स्थान तिरुवलम चुलि कहलाता है।

पद्द्रुचेरी (पांडिचेरी): पांडिचेरी के समुद्र-तट पर श्री गणेश जी का मंदिर है। यह मंदिर विदेशियों ने बनवाया था। कहा जाता है कि जब इन विनायक की पूजा के लिए भक्तजनों की संख्या बढ़ने लगी, तब विदेशी शासकों ने इस मूर्ति को समुद्र में फिकवा दिया। परंतु दूसरे ही दिन ईश्वरीय चमत्कार से यह मूर्ति अपने स्थान पर स्वतः विराजित हो गई। इसे देखकर आश्चर्यचकित विदेशी शासकों ने यहां भक्तिपूर्वक मंदिर का निर्माण करवाया।

त्रिचिनापल्ली: त्रिशीर्षगिरि (आधुनिक तिरुचिरापल्ली) की पहाड़ी पर तीन शिखर हैं, जिनमें सबसे ऊंची पहाड़ी पर गणपति विराजमान हैं। इन्हें यहां उचिप्पिल्लैयार के नाम से पुकारते हैं। इस सर्वोच्च देवता का दर्शन करने के लिए बड़े परिश्रम और कठिनाई से पूजा करने वाले ऊपर पहाड़ी पर चढ़ते हैं।

राजस्थान के श्री गणेश क्षेत्र

रायपुर (पाली): यहां गणेश जी का एक प्राचीन मंदिर है। हजारों भक्त यहां दर्शनार्थ आते हैं।

जयपुर: यहां की मोती डंूगरी की मूर्ति दर्शनीय है। यहां की पुरानी राजधानी आमेर के मंदिरों में स्थित गणपति की मूर्तियां दर्शनीय हैं।

सिद्धगणेश: सवाई माधोपुर स्टेशन से 5 मील दूर एक पर्वत शिखर पर सिद्ध गणेश का मंदिर है।

रणथंभौर: सवाई माधोपुर स्टेशन से दक्षिण पूर्व दिशा में शंृंखलाओं से घिरा भारतीय इतिहास में सुप्रसिद्ध वीर हम्मीर रणथंभौर दुर्ग पर्वत के ऊपर बना हुआ है, जहां सिद्धिदाता भगवान गणेश का सुप्रसिद्ध मंदिर एवं तीर्थ है।

श्रीकेशवराय पाटण (खड़े गणेश जी): यह स्थान कोटा जंक्शन से 5 मील दूर है। यहां चंबल नंदी में विष्णु तीर्थ है। उसके तट पर भगवान श्रीकेशव राय की चतुर्भुज मूर्ति का मुख्य पीठ स्थित है। मुख्य मंदिर के चारों ओर कई देवताओं के मंदिर हंै, जिनमें से एक गणेश जी का भी है।

उदयपुर: घाटेश्वर मंदिर के बाहर तोरण सदृश्य दो खंभों पर गणेश जी एवं नारद जी के मंदिर हैं। ये मंदिर मेवाड़ की उत्कृष्ट शिल्पकृति के नमूने हैं।

चिŸाौड़गढ़: गणेशपोल के प्रत्येक द्वार पर अंकित मंगलदाता गजानन की कई मूर्तियां मन मोह लेती हैं।

गोगुन्दा (उदयपुर): यहां 2 मील की दूरी पर श्री गणेश जी का विग्रह स्थित है। यह मंदिर बड़ा ही सुंदर है।

जालौर: जालौर दुर्ग की मकराने के पत्थर की बनी गणपति की मूर्तियां सुंदर एवं दर्शनीय हैं।

पंजाब, हिमाचल प्रदेश व कश्मीर के गणेश स्थल

पटियाला (पंजाब): पटियाला के श्री नैनादेवीजी, श्री गौरीदेवीजी, श्री सत्यनारायण जी आदि के मंदिरों में श्री गणेश की सुंदर मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं।

बैजनाथ (कांगड़ा): बैजनाथ के षड्भुज गणेश यहां के प्रसिद्ध शिव मंदिर में अवस्थित हैं।

गणेशबल (कश्मीर): यहां गणेश जी के रूप में पूजित एक विशाल स्वयंभु शिला है।

गणेश घाटी: यहां प्रसिद्ध स्वयंभु गणेश मूर्ति चट्टानाकार हैं, जिसमें उनकी सूंड़ लटकी दिखाई देती है।

उŸारांचल और उŸार प्रदेश के गणेश-स्थल

गणेश्वरी टीला (टिहरी गढ़वाल): इस क्षेत्र में एक गणेश्वरी शिला है। यह लाल रंग की है और इसका आकार हाथी जैसा है।

केदारनाथ: केदारनाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर श्री गणेश विराजित हैं। पहले इनकी अग्रपूजा होती है, पश्चात भक्तजन मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं।

गणेश गुफा: बदरीनाथ से 2 मील दूर भाणा ग्राम के निकट व्यास गुफा के समीप ही गणेश गुफा है।

आदिबदरी: यह प्रतिमा काले पाषाण की है तथा कला की दृष्टि से उत्कृष्ट है। यहां मंदिर में श्री गणेश विग्रह स्थापित है।

हरिद्वार: यहां गणेश घाट है, जहां श्री गणेश की विशाल मूर्ति है।

वृंदावन: यहां श्री गोटा-गणेश का मंदिर है तथा श्रीकात्यायनी मंदिर का श्री सिद्धगणेश का श्री विग्रह दर्शनीय है।

प्रयाग: प्रयाग को ओंकार गणेश क्षेत्र कहा जाता है। यहां जगह-जगह पर अनेक गणेश मूर्तियां स्थापित हैं, किंतु महामना मालवीय नगर और झंझरिया पुल की विशाल मूर्तियां अपने ढंग की निराली हैं।

वाराणसी: काशी के सफलप्रद श्री ढुंढिराज गणेश अन्नपूर्णा मंदिर के पश्चिम गली के दाएं मोड़ पर विराजमान हैं।

गोरखपुर: यहां के प्रसिद्ध मंदिरों में श्री गणेश भगवान का नव प्रतिष्ठित विग्रह दर्शनीय है।

बिहार प्रांत के गणेश स्थल

बिहारशरीफ: यहां के बड़े मंदिर में अन्य देवताओं के साथ श्री गणेश जी की संगमरमर की बनी हुई एक आकर्षक प्रतिमा है। यहां का दूसरा मंदिर चंदियाह-गणेशजी का है।

मांझा: यहां हथुआ रेलवे स्टेशन से 3 मील दूर श्री गणेश जी का एक स्वतंत्र मंदिर है।

बड़का गांव: सीवान से 3 मील दूर अवस्थित इस गांव में श्री गणेश जी का स्वतंत्र मंदिर है।

बडरम: सीवान से लगभग दो मील दूर दक्षिण-पूर्व के कोने पर श्री गणेश जी के विशाल एवं प्राचीन मंदिर के भग्नावशेष हैं।

राजनगर: यह दरभंगा-जयनगर लाइन पर पड़ता है। यहां गणेश जी का अत्यंत भव्य एवं विशाल मंदिर है।

बंगाल और आसाम के गणेश स्थल

बडनगर (बंगाल): अजीमगंज स्टेशन के पास इस गांव में अनेक देवालय हैं, जिनमें अष्टभुज गणेश का भी एक श्रेष्ठ मंदिर है।

गौहाटी (असम): प्रसिद्ध कामाक्षीदेवी के मंदिर में श्री गणेश जी का एक सुंदर विग्रह है। इक्कीस प्रधान गणपति क्षेत्र मोरेश्वर, प्रयाग, काशी, कलम्ब, अदोष, पाली, पारिनेर (धर्म ग्रंथों में इस मंगलमूर्ति क्षेत्र को नर्मदा के किनारे बताया गया है, किंतु इस स्थान का ठीक से पता नहीं है), मंडा-मसले, राक्षस भुवन, थेऊर, सिद्धटेक, राजनगांव, विजयपुर (ग्रंथों में यह स्थान तैलंगदेश में बतलाया गया है, परंतु इस स्थान का निश्चित पता मालूम नहीं है) कश्यपाश्रम (यह क्षेत्र शास्त्रवर्णित है, पर निश्चित स्थान अज्ञात है) जलेशपुर (यह स्थान भी अज्ञात है) लेह्याद्रि, बेरोल, पùलय, नामलगांव, राजूर और कुंभकोणम्।

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