कुंडली मिलान और मांगलिक दोष

कुंडली मिलान और मांगलिक दोष  

हमारे समाज में कुंडली मिलान की प्रथा इतनी व्यापक हो गई है कि अच्छा संबंध मिलने पर भी मेलापक के गुणों अथवा मांगलिक दोष के कारण बात अटक जाती है। कुंडली मिलाएं या नहीं, मांगलिक दोष से किस प्रकार निपटें, यही इस लेख की चर्चा का विषय है, जो आज अधिकांश माता-पिताओं का सरदर्द बना हुआ है। मांगलिक दोष की ज्योतिषीय परिभाषा पर आएं तो लग्न कुंडली में यदि मंगल लग्न में, चैथे, सातवें, आठवें अथवा बारहवें भाव में हो तो मांगलिक दोष कहलाता है। इस परिभाषा के आधार पर तो प्रति 10 में से चार स्त्री-पुरूष मांगलिक होने चाहिए। चंद्र राशि से भी यदि मंगल इन्हीं स्थानों में होता है तब भी कमोवेश मांगलिक दोष (चंद्र मंगली) माना जाता है। इन्हीं स्थानों पर यदि शनि और राहु हों या दूसरे व तीसरे भाव में भी हो तो उसका अशुभ प्रभाव भी विवाहित जीवन पर पड़ता है। दूसरे भाव के मंगल, शनि व राहु जातक को क्रोधी व कुटुंब से विरोध करने वाला बना सकते हैं, जबकि ये तीसरे भाव में शासनिक प्रवृत्ति प्रदान करते हैं, जो दफ्तर व व्यवसाय में तो लाभकारी हो सकती है परंतु पारिवारिक जीवन में नहीं। इस प्रकार यदि देखा जाये तो मांगलिक दोष हर स्त्री पुरूष में न्यूनाधिक रूप में विद्यमान रहता है। मांगलिक दोष के कारण निम्न परिणाम हो सकते हैं:- विरह, वियोग, अलगाव, पारस्परिक असहिष्णुता, विलंबित विवाह, विवाह विच्छेद, एक से अधिक संबंध, वैधव्य आदि। रामायण काल में अवतरित श्रीराम की प्रचलित जन्मकुंडली में उच्च का मंगल सप्तम (पत्नी) भाव में मांगलिक दोष इंगित करता है। श्रीराम का विवाह इस दोष के कारण उच्च कुल में तो हुआ, परंतु वे दाम्पत्य सुख से लगभग वंचित रहे। विवाह के पश्चात वनवास हुआ और फिर सीता हरण के कारण विरह वियोग। लग्न में उच्च के गुरु की शुभ दृष्टि के प्रभाव से निष्कलंकित सीता मिल तो गई, परंतु लव कुश के जन्म से पूर्व ही सीता का निष्कासन हो गया, जिसका अंत सीता की पृथ्वी समाधि के साथ हुआ और श्रीराम अंत समय तक बिना पत्नी के ही रहे। पाक मंगली दोष: जब मांगलिक दोष के साथ ही कुंडली में नीचस्थ प्रथम शत्रु क्षेत्री मंगल का शनि या राहु से पाप संबंध हो जाता है तो पाक मंगली दोष कहा जाता है, जबकि शुक्र से संबंध होने पर अनेकानेक संबंध इंगित होते हैं। पाक मंगली दोष का एक उदाहरण प्रस्तुत हैः कई वर्ष पूर्व मैं अपनी बढ़ती उम्र की कुंवारी भतीजी के लिए वर तलाश रहा था, तभी एक तीस वर्षीय विधुर का विज्ञापन दृष्टिगत हुआ, जिनके एक पुत्र था। पत्र व्यवहार करने पर ज्ञात हुआ कि उनका विवाह जिस कन्या से हुआ था, वह एक पुत्र को जन्म देकर चल बसी। ससुराल वालों ने साली से विवाह कर दिया। उसकी भी मत्यु हो गई अब पुत्र की खातिर पुनः विवाह करना चाहते हैं। मैंने उनकी जनमकुंडली मंगाई और उन्हें सलाह दी कि पाक मंगली दोष के कारण वे विवाह का विचार ही त्याग दें। बात खत्म हुई, परंतु कुछ महिनों बाद उनका पत्र आया कि क्या मेरी भतीजी अब तक अविवाहित है और क्या हम विवाह करना चाहेंगे ? हां उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उनका एक संबंध आगरा से तय हुआ था, मगर विवाह के एक दिन पूर्व ही कन्या एक सिख युवक के साथ भाग गई। बताइए, मेरा उत्तर क्या रहा होगा? विलंबित विवाह: मांगलिक दोष के कारण विलंबित विवाह एक आम बात हो गई है, जो माता-पिताओं को अति चिंता ग्रस्त रखती है। यदि मेरी मानें तो इस विलंब को सही मानकर स्वीकार कर लें। विलंब के कारण कई कुसंभावनाऐं टल जाती हैं, जैसे, अनमेल विवाह, संबंध भंग, अलगाव, कम आय से होने वाला वैमनस्य अथवा वैधव्य भी। आम तौर पर लड़के की समुचित आय न होना या दहेज तथा सर्वगुण संपन्न वधू की मांग विलंब का कारण बनते हैं। अधिक उम्र होने तक लड़का स्वावलंबी हो सकता है और तब तक उसकी दहेज व सर्वगुण संपन्न वधू की मांग भी हार मान लेती है। लड़कियों के मामले में कन्या की अपनी पसंद अथवा दहेज की मांग भी विलंब का कारण बनती है। मेरी पहचान वाली एक कार्यशील सिख कन्या गैर सिख युवक से ही विवाह करना चाहती थी, जो उसके रूढ़िवादी मां बाप को स्वीकार नहीं था। अंततः लगभग 30 वर्ष की उम्र में उसका विवाह मां-बाप चयनित सिख युवक से ही हुआ। अब वह एक पुत्री का मां है और खुश है। उसका द्विविवाह का मांगलिक दोष भी टल गया। मेरी सलाह यह है कि ऐसी स्थिति में माता-पिता को चाहिए कि वह स्पष्ट कर दें कि वे विवाह के लिए तैयार तो हैं किंतु तुरंत विवाह नहीं कर पायेंगे। जैसे-जैसे यह समय का अंतराल बढ़ता जाता है वैसे-वैसे संबंध की प्रगाढ़ता क्षीण होती जाती है और अंततः दूसरे पक्ष का धैर्य भी जवाब दे बैठता है। इस प्रकार मांगलिक दोष भी टल जाता है जो दो संबंधों का सूचक होता है। हां, यदि लड़का लड़की मांगलिक न हों तो लग्न की परिस्थितियों को देखते हुए विवाह की स्वीकृति दे देना ही उचित होगा, अन्यथा अवसाद की स्थिति, आत्महत्या का प्रयत्न या कोर्ट विवाह भी संभावित है, जो दूसरे या तीसरे भाव में पापी ग्रहों की उपस्थिति के कारण इंगित होता है। मेरी अपनी रिश्तेदारी में एक मांगलिक कन्या का विवाह तय हुआ। विवाह की तैयारियां भी हो गई थीं, तो मेरी सलाह के अनुसार नेष्ट समय गुजरने के बाद होना था। विवाह से कुछ दिन पूर्व ही एक कार दुर्घटना में वर की मृत्यु हो गई, तो मैंने माता-पिता को सांत्वना दी कि विवाह टालने का मेरा उद्देश्य यही था, क्योंकि उसकी कुंडली में वैधव्य योग था, जो इस प्रकार पूर्ण हो गया। कन्या का उचित समय पर विवाह हुआ और आज वह दो स्वस्थ बच्चों की मां है। मांगलिक दोष का एक पहलू विवाहित होकर भी पति-पत्नी का एक साथ न रहना भी होता है। जिनके पति विदेश में कार्यरत होते हैं अथवा नेवी या सेना में होते हैं वे पत्नीयां इस दोष से ग्रसित होती हैं। मेरे पास परामर्श के लिए आने वाले दंपत्तियों, विशेषकर स्त्री पक्ष से यह शिकायत मिलती है कि हमारे तो 28 या 30 गुण मिल गये थे, फिर भी हममें बनती नहीं है। जहां तक मेलापक से गुण मिलाने का प्रश्न है, वह केवल वर-वधू के नक्षत्रों पर आधारित होता है, जो इस बात को दर्शाता है कि उनके स्वभाव एवं रूचियों में विरोधाभास तो नहीं है तथा उनकी चंद्र राशियां परस्पर शत्रु तो नहीं है। यह मेलापक वर-वधू की जन्मकुंडलियों में विभिन्न ग्रहों की स्थिति और उनके प्रभाव से अछूता रहता है। मेलापक द्वारा एक दुष्ट पुरुष और एक सीधी सादी कन्या के भी 30-30 गुण मिल सकते हैं। हां, परंतु इस बात की पूर्ण संभावना रहती है कि कन्या पति को उसी रूप में स्वीकार कर ले चाहे इसे पारंपरिक संस्कार कहिए या स्त्री की संपूर्ण समर्पण भावना। गुणों और कुंडली मिलान के बाद भी आजकल अनबन की शिकायतें आती है। इसकी विवेचना के लिए हमें आदि काल से लेकर वर्तमान काल तक के सामाजिक परिवेश को दृष्टिगोचर करना होगा। आदित्य काल में पुरुष का दायित्व शिकार करके भोज्य सामग्री जुटाना तथा स्त्री का संतान पालन और गृह प्रबंधन करना होता था। इसलिए पति का शासन चलता था और इसलिए पुरुष प्रधान समाज की सृष्टि हो गई थी। विवाह संस्था का अविर्भाव भी इसी उद्देश्य से हुआ था। वैदिक काल में पत्नी पति के अनुशासन में रहे, इसलिए ‘पति परमेश्वर’ एवं ‘पतिव्रत धर्म’ जैसी धारणाओं को महिमा मंडित किया गया था। पुरुष को बहु विवाह के अधिकार के साथ ही देवदासियों और गणिकाओं को भी मान्यता मिल गई थी। इन संस्कारों के चलते स्त्रियां पति की ‘चरणदासी’ तो रहीं, मगर उनकी मांगलिक प्रवृत्ति दूसरे रूप में प्रस्फुटित होती रही। धनिक वर्ग की स्त्रियां परिचारक परिचारिकाओं पर शासन कर सकती थीं और मध्य वर्ग की स्त्रियां संतान और बहुओं पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लेती थीं। आज भी यह ‘सास-बहु’ का प्रकरण दूरदर्शन की चैनलों की आय का स्रोत बन गया है। वस्तुतः धर्म में आस्था और पुरातन संस्कारों से प्रतिबद्ध नारी पुरुष को ही स्वामित्व प्रदान करती रही है। यह स्थिति बीसवीं सदी के पूर्वार्ध तक तो चली ही, जब कुंडली मिलान की आवश्यकता भी नहीं समझी जाती थी। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नारी स्वातंत्र्य का युग आया, जिसकी शुरुआत पश्चिमी देशों से हुई। साठ के दशक में मुझे उच्च तकनीकी प्रशिक्षण के लिए सोवियत रूस में रहना पड़ा था। सोवियत रूस उन दिनों महाशक्ति बनने की होड़ में था, लिहाजा हर पुष्ट पुरुष को कारखानों में या सेना में रख दिया जाता था, जबकि स्त्रियों का वर्चस्व दुकानों, अस्पताल, होटल, बैंक, कार्यालयों, स्कूल और रेलवे में ऊपर से नीचे तक काविज था। इस नारी स्वावलंबना की परिणति संसार की सर्वाधिक तलाकदर में हो चुकी थी। अधिकतर विवाह 20 वर्ष की उम्र तक हो जाते थे। संवेग और भावनाओं के वशीभूत होकर किए यह विवाह मामूली अनबन से ही तलाक में परिवर्तित हो जाते थे, जो वहां अति सरल कानूनी प्रक्रिया थी। आज सभी पश्चिमी देशों में यह स्थिति बन चुकी है और भारत की चैखट पर भी दस्तक दे चुकी है। भारत में पिछले दो दशक से स्त्री-शिक्षा में असाधारण प्रगति के कारण शहरी महिलाओं को नौकरी से पुरूषों के समकक्ष निजी आय भी होने लगी है। दोहरी आय वाले दंपत्तियों में किसका शासन चले, यह विवाह वैवाहिक विघटन का एक बड़ा कारण बन रहा है। स्त्री की मांगलिक प्रवृत्ति, जो संस्कारों और सामाजिक बंधनों के कारण दमित रहती थी, अब उजागर होने लगी है। निम्न वर्ग और ग्रामीण महिलाएं अभी तक इस बंधन को पूरी तरह नहीं तोड़ पाई है। एक बहुचर्चित हिंदी फिल्म में संभ्रांत परिवार की एक महिला, जो स्वयं पति से अलग होने के कगार पर है, अपनी नौकरानी से उसके चेहरे की चोट का कारण पूछती है। नौकरानी बताती है कि उसके आदमी ने शराब पीकर मारा था। महिला कहती है तो तू उसे छोड़ क्यों नहीं देती ? उत्तर था- कैसे छोड़ दूं मालकिन, सात जन्मों का बंधन है। उर्दू व हिंदी के प्रख्यात कथाकार, कृशन चंदर की एक कहानी में चाल में रहने वाला पुरुष अपनी स्त्री को मार रहा था। बचाने के लिए आये लोगों को स्त्री ने यह कहकर झिड़क दिया - मेरा आदमी है। मुझे मार रहा है। तुम लोगों को क्या ? मेडिकल विज्ञान के अनुसार प्रौढ़ावस्था में स्त्री में उस हारमोन की कमी होने लगती है जो नारी सुलभ गुणों (लज्जा, शालीनता, समर्पण भावना) का जीवन दाता है और पुरुषों में वह हारमोन क्षीण होने लगता है, जो उसे शासन करने व स्वामित्त जताने की प्रवृत्ति का देनदार है। इस अवस्था में स्त्री संतान के शादी व्याह, लेन देन आदि मामलों को अपने अधिकार क्षेत्र में लेने के लिए प्रयत्नशील हो जाती है जिसे अधिकांश पुरूष सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। हां, स्त्री की मांगलिक होने की स्थिति में यह प्रवृत्ति अति उग्र हो जाती है। दहेज की मांग या बहू को प्रताड़ित करना भी इसी प्रवृत्ति की देन है। यदि पुरुष भी मांगलिक हुआ तो स्थिति और भी विकट हो सकती है। नव विवाहितों में अनबन का कारण पत्नी का समान अधिकार की मांग करना है। वैवाहिक विज्ञापनों में युवकों को व्यवसाय में प्रशिक्षित कन्या चाहिए। यदि उनकी यह इच्छा है तो उन्हें कुकिंग कोर्स भी कर लेना चाहिए। वास्तव में वे परंपरागत पति सेवा के हकदार नहीं है। युवतियों को भी चाहिए कि अपने स्वतंत्र आय जनित अहंकार को संयमित रखें। हाल के एक लेख में मैंने पढ़ा था कि आपकी आर्थिक स्वावलंबी कुमारियों को ‘पति’ नहीं ‘पत्नी’ चाहिए। जो युवतियां अपनी नौकरी, पति और गृह प्रबंधन में सामंजस्य बना लेती है, उनका वैवाहिक जीवन मनोचिकित्सक या ज्योतिषी से परामर्श करने की अपेक्षा नहीं रखता है। संतान के विवाहेच्छुक माता-पिता को परामर्श अब मैं अपने ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर निम्न परामर्श देना चाहूंगा: हर जातक के 10-12 वर्षों के दौरान एक या दो वर्ष ऐसे गुजरते हैं, जब शनि व गुरु, दोनों प्रभावशाली ग्रह ‘शुभ’ गोचर में होते हैं। यह स्थिति तब बनती है जब शनि चंद्र राशि से तीसरे, छठे अथवा ग्यारहवें स्थान में और गुरु दूसरे, पांचवें, सातवें, नवें या ग्यारहवें स्थान से संचरित होते हैं। यह वर्ष विवाह के लिए ‘योग कारक’ समय होते हैं। इन वर्षों में स्वतः ही संबंध बनने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और यदि काफी भाग दौड़ के बाद भी विवाह नहीं हो रहा हो तो बात बनने की अनायास ही संभावना हो जाती है। इस गोचर स्थिति में बिना कुंडली मिलाए ही विवाह कर सकते हैं क्योंकि गोचर के शुभ प्रभाव से सर्वाधिक अनुकूल संबंध स्वतः ही हो जाता है। हां, भाग्य तो अपना अपना होता ही है। यह स्थिति कम उम्र (20-25 वर्ष) में भी बनती हो और वर की आय समुचित न हो या कन्या का विद्याध्ययन पूरा न भी हुआ हो तब भी विवाह करने में संकोच न करें। हां, पाक मंगली होने की स्थिति में 25 वर्ष की उम्र के बाद ही इस योग की प्रतिक्षा करें। सादा मांगलिक होने की स्थिति (जब मंगल स्वगृही या उच्च हो और पाप ग्रहों से दृष्ट न हो) में कम उम्र में भी विवाह किया जा सकता है। यूं तो मांगलिक प्रभाव कुंडली मिलाने से भी नहीं टाला जा सकता है। दूसरी कम अनुकूल स्थिति तब बनती है जब गुरु शुभ गोचर में हो परंतु शनि ‘अशुभ’ गोचर (साढ़ेसाती व ढैया) में न हो। ऐसी स्थिति में कुंडली मिलान की रस्म कर सकते हैं, परंतु 25 से कम गुण मिलने की स्थिति में विवाह तभी करें जब तक लड़का लड़की एक दूसरे को परख न लें। गोचर की उस स्थिति में विवाह कदापि न करें जब शनि और गुरु दोनों ‘अशुभ’ संचार कर रहे हों। यह स्थिति शनि की साढ़ेसाती और ढैया के दौरान तथा गुरु के छठे, आठवें व बारहवें स्थान में संचार करने पर बनती है। इस भ्रम को न पालें कि गुणों के मिलान और मांगलिक दोष के निवारण के बाद सब कुछ ठीक हो जाता है। इस लेख में सामाजिक परिवेश व नर-नारी मनोविज्ञान के संदर्भ में स्त्री पुरुष की प्रवृत्ति की विवेचना इसी उद्देश्य से की गई है।


योजनापूर्वक इच्छित संतान विशेषांक  जनवरी 2012

शोध पत्रिका के इस अंक में अधिकतर आलेख योजनापूर्वक इच्छित संतान प्राप्ति के महत्वपूर्ण विषय पर हैं।

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