हर की पौढ़ी, हरिद्वार का वास्तु आकर्षित करता भक्तों को

हर की पौढ़ी, हरिद्वार का वास्तु आकर्षित करता भक्तों को  

सम्बंधित लेख | व्यूस : 1439 |  

विश्व में सभी धर्मों में पूजा-पाठ, धार्मिक पर्व आदि के लिए हर जगह मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे इत्यादि बने हुए है। उनमें से कुछ स्थान विशेष आस्था के केन्द्र बने हुए है। जैसे भारत में नदियां तो कई है। जिनका अपना-अपना महत्व है, किंतु हिंदू धर्म में गंगा नदी की अपना एक विशेष महत्व रखती है। भारत में गंगा नदी को देवी का दर्जा प्राप्त है। वैसे तो गंगा भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक भूमि को सिंचती हुई जाती है, परंतु कुछ स्थानों पर इस पावन पवित्र नदी का धार्मिक महत्व बहुत ही ज्यादा है। आखिर ऐसा क्यों हैं कि, एक ही नदी है और जल भी वही है? वास्तुशास्त्र के अनुसार केवल वही स्थान विशेष धार्मिक आस्था का केंन्द्र बनता है। जिन स्थानों की भौगोलिक स्थिति धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक वास्तुनुकुल होती है।

प्राचीनकाल से प्रत्येक हिंदू के मन में एक अभिलाषा रहती है कि, जीवन में एक बार गंगा नदी में स्नान कर अपने पापों से मुक्ति पाकर मोक्ष को प्राप्त हो और उसके लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध स्थान है हरिद्वार स्थित ब्रह्मकुण्ड। वहीं ब्रह्मकुंड जिसके समीप ही पत्थर से बने एक मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिन्ह है। ब्रह्मकुंड में भक्तजन स्नान करते है। उस मंदिर के साथ लगा हुआ जो घाट है, उसे ही हर की पौढी कहते है। आईए देखते है कि हरिद्वार और वहां स्थित हर की पौढ़ी के आसपास के क्षेत्र में ऐसी कौन सी भौगोलिक वास्तुनुकुलताएं है जो श्रृद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

हरिद्वार के एक ओर हिमालय पहाड़ की पर्वतमाला है। जहां पूर्व और पश्चिम की ओर से मिली हुई शैवालिक पर्वत की दो शाखाएं है। पश्चिम स्थित शैवालिक पर्वत की एक शाखा बिल्वा पर्वत जहां पर मनसादेवी का मंदिर है। बिल्वा पर्वत की पूर्व दिशा की तलहटी पर हर की पौढ़ी स्थित है। हर की पौढ़ियां भी इस पर्वत को काट कर बनाई गई है। हर की पौढ़ी के सामने वह घाट है जहां घंटाघर स्थित है और इस घाट के बाद पूर्व दिशा में गंगा की दूसरी नहर एवं गंगा की मुख्य धारा बह रही है। कुल मिलाकर हर की पौढ़ी के ठीक निकट पश्चिम में ऊंचाई और सामने दूर तक पूर्व दिशा में नीचाई है।

हर की पौढ़ी के पश्चिम में भीम गोड़ा रोड़ एवं गंगा सभा कार्यालय ऊंचाई पर है। हर की पौढ़ी के एकदम पास वाली सड़क अपर रोड़ के अंतिम छोर पर जो पुल पर समाप्त होती है इस पुल का यह छोर सड़क के लेवल के बराबर है। जबकि पुल का दूसरा छोर हर की पौढ़ी के सामने उस घाट तक है जहां घटांघर है वहां पर 15-16 फीट की नीचाई है। इसलिए घंटाघर वाले घाट पर जाने के लिए सीढ़ियां उतरनी पड़ती है।

हरिद्वार में गंगा नदी उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर बह रही है। किंतु हर की पौढ़ी से लगभग 150-200 मीटर पहले श्मशान के पास जहां पर पंजाब सिंध क्षेत्र का भवन है। वहां से घुमकर ईशान कोण से हर की पौढ़ी की तरफ आती है और हर की पौढ़ी के बाद कुछ मीटर दूरी पर ही उपरोक्त पुल के नीचे पुनः पूर्व की ओर मुड कर गंगा नदी दक्षिण वाहिनी हो जाती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार इस प्रकार पश्चिम में ऊंचाई और पूर्व दिशा में नीचाई और वहां पर पानी हो ऐसे स्थान लोगों की ऐसी धार्मिक आस्था का केंद्र बन जाता है। जहां भक्तजन मोक्ष पाने की और सन्यांसी सिद्धी पाने की कामना करते है।

यूं तो हरिद्वार की जमीन समतल है। किंतु हर की पौढ़ी से दक्षिणी दिशा की ओर जहां मेन बाजार, अपर रोड, मोती बाजार, सब्जी मंडी, भल्ला रोड़ तथा रिक्शा स्टैण्ड के आसपास का भाग की जमीन का ढलान दक्षिण दिशा से हर की पौढ़ी की तरफ उत्तर दिशा की ओर है। वास्तुशास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में ऊंचाई हो और उत्तर दिशा की ओर ढलान हो वह स्थान, भवन, शहर प्रसिद्धि पाता है। जैसे जयपुर की पिंक सिटी वाले भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर ढलान है, गुडगांव में भी दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर ढलान है। ताज महल के उत्तर दिशा में यमुना नदी बह रही है। उत्तर दिशा की यह वास्तुनुकुलता ही हर की पौढ़ी वाले क्षेत्र को विशेष प्रसिद्धि दिलाने में अत्यधिक सहायक हो रही है।

हर की पौढ़ी एवं उसके आस-पास की इसी भौगोलिक स्थिति के कारण ही यहां के घाटों का सौन्दर्य विस्मयपूर्ण है जब जब रोजाना हजारो दीये एवं गंेदे के फूल पवित्र जल पर तैरते हुए प्रदीप्त होते है। सांध्यकाल में सूर्यास्त के बाद यहां होने वाली गंगा आरती यहां आने वाले पर्यटकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त होता है।

फेंग शुई सिद्धांत

फेंग शुई का एक सिद्धांत है कि, यदि पहाड़ के मध्य में कोई भवन बना हो, जिसके पीछे पहाड़ की ऊंचाई हो, आगे की तरफ पहाड़ की ढलान हो, और ढलान के बाद पानी का झरना, कुंड, तालाब, नदी इत्यादि हो, ऐसा भवन प्रसिद्धि पाता है और सदियों तक बना रहता है। फेंग शुई के इस सिद्धांत में दिशा का कोई महत्त्व नहीं है। ऐसा भवन किसी भी दिशा में हो सकता है। हर की पौढ़ी की पश्चिम दिशा में बिल्वा पर्वत की ऊंचाई है। उसके बाद गंगा सभा कार्यालय भवन है। फिर पौढ़ियां है और उसके बाद हर की पौढ़ी स्थित ब्रह्म कुंड स्थित भगवान विष्णु का मंदिर है। इसके आगे पूर्व दिशा की ओर गंगा नदी की धाराएं बह रही है। जो क्रमशः गहरी है।

इस प्रकार हर की पौढ़ी वास्तु एवं फेंग शुई दोनों सिद्धांतों के पूर्णतः अनुरूप होने से यह स्थान भारत ही नहीं विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।



अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.