शिव के अष्टरूप

शिव के अष्टरूप  

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शिव के अष्टरूप निरंतर सेवा में संलग्न है।

☆जल ☆

☆अग्नि☆

☆यजमान☆

☆सूर्य☆

☆चंद्रमा☆

☆आकाश☆

☆पृथ्वी☆

☆वायु☆

  1. ☆ शिव का प्रथम रूप सृष्टि है। सृष्टि अर्थात जल जो विधाता की सर्वप्रथम रचना है। इसलिए जल ही जीवन है। जल के बिना जीव जगत की रक्षा नहीं हो सकती। अतः यह शिवजी का रूप निरंतर सेवा में संलग्न रहता है।
  2. ☆ शिव का द्वितीय रूप अग्नि है जो यज्ञ में विधिपूर्वक हवन की गई हवन सामग्री को ग्रहण करती है। अतः शिव का रूप अग्नि यज्ञ के धूम से उत्पन वातावरण को शुद्ध करता है और प्राणियों के विभिन्न रोगों को नष्ट कर निरंतर जीव जगत की सेवा में संलग्न है
  3. ☆ शिव का तृतीय रूप यजमान है जो यज्ञ हवन कर्ता है। सृष्टि के कर्म यज्ञ है और यज्ञों का कर्ता यजमान है। अतः ये शिव का रूप यजमान यज्ञ के धूम से जगत प्रदूषण नष्ट कर निरंतर सेवा में संलग्न रहता है।
  4. ☆ शिव का चतुर्थं रूप सूर्य है जो जीव जगत का नेत्र है जिससे समस्त संसार प्रकशित होता है। सूर्य ही संसार की आत्मा है। इन्हीं के कारण संसार की समस्त गतिविधियां चलती है। अतः यह शिव का रूप सूर्य जीव जगत को प्रकशित करता हुआ निरंतर संलग्न रहता है।
  5. ☆ शिव का पंचम रूप चंद्र है जो रात्रि का विधान करता है। चंद्र निशापति और औषधिपति है। शिव का ये रूप औषधि यों में रसों का संचार करता हुआ रात्रि को प्रकशित कर जी वों को विश्राम देता हुआ सेवा में संलग्न रहता है।
  6. ☆ शिव का छठा रूप आकाश है जो समस्त विश्व को व्याप्त कर स्थित है इसमें अनंत ब्रह्माण्ड और अनेक गंगाएँ समाहित है। इसमें श्रवण शक्ति विद्यमान है। इसमें ही शब्द् गूंजते हैं। यह समस्त जीव जगत को श्रवण शक्ति प्र दान करता हुआ निरंतर सेवा में सलग्न हैं।
  7. ☆ शिव का सप्तम रूप पृथ्वी है जो समस्त जीवों की जननी है। अन्नादि बीजों से प्राणियो की भूख शांत होती है। अतः शिव का ये रूप पृथ्वी समस्त जीव जगत का भार वहन करती है और अन्नादि से जीवों की रक्षा करती हुई निरंतर सेवा में संलग्न है।
  8. ☆ शिव का अष्टम रूप वायु है जो समस्त विश्व का प्राण है। यदि वायु न हो तो जीव जगत निष्प्राण है। प्राणियों में वायु श्वास ही तो जीवन है अतः भगवान शिव का अष्टम रूप वायु प्राणियों के शरीर में प्राण दान करता हुआ निरन्तर सेवा में संलग्न रहता है।

☆ शिवा ही आधी और अंत है।

☆ शिवा की इन सेवाओं का लाभ लेते हुए हमें याद रखना चाहिए कि सेवा भाव से किया कोई भी कार्य हमें कहीं न कहीं आत्मशांति आत्मसंतुष्टि देता है। शिवा ने अपनी सेवाओं की रक्षा के लिए हलाहल पिया और नीलकंठ कहलाए क्या इतना समर्पण हम शिव अंशों में हैं।

☆क्यों हम द्वेष और बदले की भावना में एक दूसरे को काट रहे हैं। क्यों नहीं हम उस परम पिता परमेश्वर शिवा की तरह सेवा और देने की भावना सीखते।

ॐ शिवा ॐ

☆ शिवो गुरु:शिवो देव:शिवो बन्धु:शारीरिणाम्।
☆शिव आत्मा शिवो जीव:शिवदन्यनन किच्चन।।

☆भगवान् शिव गुरु है,शिव देवता है और शिव ही समस्त प्राणियों के एक मात्र हितैषी एव बन्धु है। शिव ही आत्मा है और शिव ही जीवनस्वरूप प्रतिष्ठित है। शिव से भिन्न कुछ दूसरा नहीं है। सभी विद्याओं के ईश्वर, विद्यातीर्थ भगवान् श्रीसाम्ब सदाशिव और उनका पावन नाम सभी कल्याणों को देने वाला और सभी अमंगलों को दूर करनेवाला है। जिस प्रकार भगवान् का नाम-रूप, लीला और धाम परम कल्याणकारक है। वैसे ही उनकी मधुर वाणी भी परम कल्याणकारक है।

☆ जीवों के आत्यंतिक कल्याण के लिए तथा लोकजीवन के उपसर्गमय सेवा दर्शन के लिए ही वे सगुण साकार रूप में सशक्तिक अभिव्यक्त होते हैं और अपनी रहनी करनी से उदंत जीवनचर्या की सिख देते हैं न केवल शिव की शिवमय वाणी, अपितु उनकी चर्या भी सच्ची सिख प्र दान करनेवाली है।

☆उन्होंने न केवल अपनी वाणी से ही, अपितु मौन व्याख्यान से, अपनी समाधिभाषा से, अपनी इंगित चेष्टाओं से और अपने व्यवहार से सेवामय जीवन की शिक्षा प्र दान की है। उनके मौन व्याख्यान में, उनकी समधी भाषा में, उनकी नृत्यमुद्रा में, उनके अनुग्रहमय शांत शिवस्वरूप में और उनके विभुति धारण में उत्कृष्ट साधना पथ का निदेश समाहित है। जो भगवान् शिव के जीवनदर्शन को, उनके वचन मंत्रों को, उनकी आज्ञा को, उनके परामर्श को अपने जीवन में उतार लेता है। सुचमुच वह सम दर्शन में प्रतिष्ठित हो जाता है और शिवस्वरूप ही हो जाता है। जैसे भगवान् शिव अनादीनिधन है, वैसे ही उनका बोध भी अनादिनिधन है।



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