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क्या पति पत्नी मे प्रेम संबंध की प्रगाढ़ता वास्तु उपाय द्वारा बढ़ाई जा सकती हैं ?
 (i)हां
 (ii) नहीं
 (iii)पता नहीं

  

 

 

  

निर्माण कार्य का आरंभ

पं. जय प्रकाश शर्मा (लाल धागे वाले)

निर्माण कार्य का आरंभ करने से पहले निम्न बातों का ध्यान अवष्य रखें :

 

  •  भूमि पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन व गृह प्रवेश आदि कार्य शुभ मुहूर्त में ही करें।

  •   कुंआ, बोरिंग व भूमिगत टंकी उत्तर, पूर्व या ईशान में बना सकते हैं। वास्तु पुरुष के अतिमर्म स्थानों को छोड़कर। मर्म स्थानों पर दीवार, कॉलम, बीम व द्वार आदि बनाने से बचना चाहिए।

नीचे भूखंड के अति मर्म स्थान व मर्म स्थान दिखाए गए हैं। ब्रह्म स्थान में पांच अति मर्म स्थान होते हैं। चार ब्रह्म स्थान के चारों कोने व पांचवा ब्रह्म स्थान का मध्य। इसके अतिरिक्त ३२ मर्म स्थान तारांकित छोटे चिह्नों से दिखाए गए हैं।

  •   भूखंड में मुख्य निर्माण चार दीवारी के साथ का पिशाच क्षेत्र छोड़कर करें। भूखंड को ८१ भागों में बांट कर चार दीवारी के ३२ भागों को खुले स्थान के रूप में छोड़ दिया जाता है। उससे अंदर के १६ भाग देव क्षेत्र के रूप जाने जाते हैं। बीच ९ भाग ब्रह्म स्थान कहलाते हैं।

  •   आवासीय भूखंड में बेसमेंट नहीं बनाना चाहिए। यदि बेसमेंट बनाना आवश्यक हो तो उत्तर, पूर्व और ईशान में ब्रह्म स्थान को बचाते हुए बनाना चाहिए। बेसमेंट की ऊंचाई कम से कम ९ फीट हो और ३ फीट तल से ऊपर हो ताकि प्रकाश व हवा आ जा सके।

  •   भवन का दक्षिणी भाग हमेशा उत्तरी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन का पश्चिमी भाग हमेशा पूर्वी भाग से ऊंचा होना चाहिए। भवन में नैऋत्य सबसे ऊंचा और ईशान सबसे नीचा होना चाहिए। भूमि का स्त्र मुख्य मार्ग से ऊंचा होना चाहिए।

  •   चार दीवारी के अंदर सबसे ज्यादा खुला स्थान पूर्व में छोड़ें। उससे कम उत्तर, उससे कम पश्चिम में, सबसे कम दक्षिण में छोड़ें। इससे पूर्व व उत्तर से आने वाली शुभ ऊर्जा की वृद्धि होगी।

  •   दीवारों की मोटाई सबसे ज्यादा दक्षिण में, उससे कम पश्चिम में, उससे कम उत्तर में, सबसे कम पूर्व में रखें। इससे दक्षिण व पश्चिम भारी हो जाएगा व उत्तर और पूर्व हल्का हो जाएगा। इस नियम को चार दीवारी पर और आंतरिक निर्माण में भी लागू करें।

  •   द्वार की चौड़ाई उसकी ऊंचाई से आधी होनी चाहिए। मुख्य द्वार सब द्वारों से बड़ा होना चाहिए।

  •   खिड़िकियां व रोशनदान घर के उत्तर व पूर्व में अधिक तथा दक्षिण व पश्चिम में कम बनाने चाहिए।

  •   ब्रह्म स्थान को खुला, साफ तथा हवादार रखना चाहिए। ब्रह्म स्थान पर जूठे बर्तन, चप्पल, कूड़ा-करकट व भरी सामान नहीं रखना चाहिए।

  •   नींव की खुदाई के समय सौर मास बैसाख व फाल्गुन होने पर वायव्य कोण से खुदाई शुरू करें। सौर मास ज्येष्ठ और श्रावण होने पर नैऋत्य कोण से, सौर मास मार्गशीर्ष व माघ होने पर ईशान कोण से खुदाई करनी चाहिए। भूमि पूजन भी इन्हीं दिशाओं में ही करें। अर्थात सौर मास मार्गशीर्ष व माघ में भूमि पूजन करना हो तो ईशान कोण में ही करें।

  •   शिलान्यास के समय नींव में रखने योग्य पदार्थ नए व शुद्ध होने चाहिए। एक तांबे के लोटे में चावल भरकर रखें। ५ नई ईंटे, ५ प्रकार के रतन, नाग-नागिन का जोड़ा, ५ कौड़ियां, ५ साबुत सुपारी, श्रीफल, तीर्थ स्थान की मिट्टी, गंगा जल व लाल रंग के वस्त्र की आवश्यकता पड़ती है।

  •   गृहारंभ के समय ८१ पद वाला वास्तु चक्र बनाकर ४५ देवताओं की पूजा की जाती है। शुभ समय का निर्धारण करके प्रभु कृपा पाने के लिए पूजा-पाठ, हवन, गणेश पूजा, भूमि पूजा व वास्तु देव पूजा करनी चाहिए। गृहारंभ के समय आचार्य, ब्राह्मण, वास्तुकार व मिस्त्री आदि को विधिवत्‌ संतुष्ट करें। ऐसा करने से घर में सदा सुख-शांति रहती है। शुभ मुहूर्त के इंतजार में यदि गृहारंभ कार्य को देरी भी हो रही है तो इंतजार कर लेना चाहिए।

  •   भव के सामने कोई वास्तु वेध हो रहा हो तो उसका विचार भी कर लेना चाहिए। भवन व मुख्य द्वार के सामने कोई अशुभ वृक्ष, मंदिर, खंभा, टूटा-फूटा मकान, गड्ढा, श्मशान घाट, शिला, भट्टी व ओखली नहीं होनी चाहिए।

  •   भवन के सामने से किसी ऊंचे भवन की छाया पड़ने से छाया वेध कहलाता है। इससे घर में आने वाली धूप व हवा में बाधा पड़ती है।

  •   भवन के सामने वाले भवन का कोई कोना भवन को तीर की तरह चुभ रहा हो तो इमारत वेध कहलाता है।

          भवन के सामने कोई कुआं आदि होने से द्वार के सामने कीचड़ व जल आदि हो सकता है जो कि शुभ नहीं है।

 

 
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