Untitled Document


     
 
 
-
 
Untitled Document
मुख्य पृष्ठ
आपके पत्र
  संपादकीय
ज्योतिषीय समाचार
ज्योतिषीय सामग्री
सामयिक चर्चा
व्रत/पर्व
आवरण कथा
श्री हनुमान महिमा
सत्य कथा
ज्योतिष गंगा
हेल्थ कैप्सूल
    हस्तरेखा
 विचार गोष्ठी
अध्यात्म
पावन स्थल
ज्ञान सरिता
समस्या समाधान
वास्तु परामर्श
वास्तु समाधान
टोटके
राशिफल
शेयर बाजार
ग्रह स्थिति व्यापार
पुस्तक समीक्षा
पंचांग
राहुकाल
ग्रह स्पष्ट
प्रश्न जन्मपत्री
मुफ्त उपहार
क्या नास्तिक व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति का कारण उसके पूर्व जन्म के कर्मों का फल है?  
 (i)हां
 (ii) नहीं
 (iii)पता नहीं

  

 

सत्यकथा

मौत का सामना

आभा बंसल, फ्यूचर पॉइंट

इन्सान अपनी जिंदगी को संवारने का हरमुमकिन जतन कर लेता है, पर जब ग्रह प्रतिकूल होते हैं, तो उसकी सारी तदबीरें धरी की धरी रह जाती हैं, जिंदगी की तस्वीर बदल जाती है। फिर वही ग्रह जब अनुकूल होते हैं, तो उसे बड़ी से बड़ी विपत्तियों से भी शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है। विजय के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? आइए, जानें...

किसी व्यक्ति का भाग्य उसके पूर्व जन्मों और वर्तमान कर्मों तथा ग्रह स्थिति और गोचर के आधार पर बनता और बिगड़ता है। कभी-कभी जिंदगी में चमत्कार डॉक्टरों और इन्सानों की समझ से बाहर होते हैं। जिंदगी और मौत के बीच झूलता इन्सान, जिसके जीने की आशा तक नहीं रह जाती, सिर्फ ग्रह गोचर के बदलने और दान, तप, जप तथा अपनों की दुआ से मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।

ऐसी ही कथा है एक साधारण परिवार में जन्मे विजय नामक व्यक्ति की, जो मध्यवर्गीय माहौल में पला बढ़ा और एक छोटे से शहर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात्‌ छोटी सी नौकरी से जीवन का सफर शुरू किया। देखते ही देखते वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया और कंप्यूटर क्षेत्र की प्रथम श्रेणी की कंपनी विप्रो में ऊंचा पद प्राप्त किया। बंगलूर की कंपनी, अनजान शहर में उसने नाम, पैसा, शोहरत प्राप्त की। लेकिन खुशहाल जीवन के इस सफर में अचानक एक दिन १६ अगस्त २००९ की सुबह विजय का प्यारा कुत्ता शेरू गुम हो गया। विजय को हल्का बुखार था, परंतु अपनी बीमारी को भूलकर वह अपने कुत्ते को ढूंढने निकल पड़ा। उसने पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई, परंतु दो दिनों तक शेरू का कोई पता न चला। १८ अगस्त २००९ को विजय की तबीयत बिगड़ गई। १०३० बुखार और सांस लेने में तकलीफ हुई, तो उसकी पत्नी ने उसे अस्पताल में आइ. सी. यू. में भर्ती करवाया। रात भर में ही उसकी तबीयत और बिगड़ गई और उसके फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। उसकी बिगड़ती हालत को देखकर उसे १९ अगस्त को जीवन रक्षक वेंटिलेटर पर रख दिया गया। बीमारी जटिल होती गई, डॉक्टरों ने अच्छी से अच्छी एंटीबायॉटिक इंजेक्शन दी, पर उसका भी कोई असर न हुआ। इसी बीच विजय कॉमा में चला गया। डॉक्टरों ने घर वालों को जवाब दे दिया। सभी सगे संबंधी २० अगस्त को दिल्ली से बंगलूर पहुंच गए। इलाज का खर्च विजय की कंपनी के लोग कर रहे थे। वे डॉक्टरों से लगातार बातचीत भी कर रहे थे। कंपनी के  पदाधिकारियों का पूरा दबाव अस्पताल वालों पर था। वे डॉक्टरों की कॉन्फ्रेंस अमेरिका के नं. 1 अस्पताल के डॉक्टर से भी करवा रहे थे। कोई भी कमी नहीं हो रही थी, परंतु विजय की हालत में कोई सुधार नहीं था। वह तो वेंटिलेटर पर बेजान पड़ा  था। विजय की पत्नी का रवैया तो बहुत बेपरवाह था। वह तो किसी भी अशुभ समाचार के लिए तैयार थी। परंतु विजय के सगे संबंधी का तो ईश्वर पर अटूट विश्वास था। उन्होंने ज्योतिर्विद से परामर्श लेकर महामृत्युंजय जप करवाना आरंभ कर दिया और स्वयं भी लंबी आयु की प्रार्थना करने लगे। मंदिर में जाकर पाठ, पूजा, गरीबों को दान आदि करने लगे।

ऐसा करते-करते दस दिन बीत गए, परंतु हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। विजय बिल्कुल हिलडुल भी नहीं रहा था। उसके भाई-बहन, माता-पिता को यह लगने लगा कि कहीं डॉक्टर पैसा बनाने के लिए उन्हें बेवकूफ न बना रहे हों। उनके सब्र का बांध टूटता जा रहा था। डॉक्टरों का कहना था कि वे अच्छे के लिए कोशिश कर रहे हैं। अपने मन के डर को दूर करने के लिए परिवार के लोगों ने जन्म पत्रिका का विश्लेषण दोबारा करवाया तो ज्योतिषियों ने कहा कि मृत्यु योग बना हुआ है। ०९ सितंबर २००९ तक कुछ भी हो सकता है। ज्योतिषियों उन्हें दान, जप, तप, नियमित रूप से करने को कहा और ज्योतिष में अपने विश्वास को बनाए रखने की सलाह दी। उन्होंने विश्वास दिलाया कि ईश्वर ने चाहा, तो विजय को कुछ नहीं होगा। उन्होंने कहा कि जिसके माता-पिता की ईश्वर में इतनी गहरी आस्था हो, जप, तप, हवन, गरीबों की सहायता करने में कोई भी पीछे न हटता हो, उसे कुछ नहीं हो सकता। सभी परिवारजन, दोस्त, सहकर्मी विजय की लंबी उम्र के लिए रात दिन दुआ मांगने लगे, परंतु उनकी रातों की नींद और चैन पूर्णतः समाप्त हो गया था, क्योंकि १० सितंबर २००९ के आने में अभी १२ दिन थे। विजय के भाई को ईश्वरीय शक्ति पर पूरा विश्वास था, इसलिए उसने डॉक्टर को दावे के साथ कह दिया कि उनका भाई १० सितंबर २००९ को आंखें खोलेगा। विजय को उनके लिए वापस आना ही होगा। इसी बीच विजय के गुर्दे ने भी काम करना बंद कर दिया। फिर उसे डायलिसिस पर भी रख दिया गया। डॉक्टर ने ०५ सितंबर २००९ को ब्रोंडोस्कॉपी की, जिससे उन्हें कुछ उम्मीद की किरण मिली। उन्होंने उसकी दवा बदल दी और घर वालों को ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि हमें उम्मीद है, ४८-७२ घंटे में विजय आंखें खोलेगा। लेकिन चार दिन बीत गए, उसने आंखें नहीं खोलीं। इधर सभी की धड़कनें तेज हो रही थीं उधर विजय की पत्नी को न तो विजय की जरा भी परवाह थी, न ईश्वर में आस्था। उसने तो कभी भगवान के मंदिर में दीपक भी नहीं जलाया था। इन सब चीजों को नजरअंदाज करते हुए वह रोज बाजार और ब्यूटी पार्लर जाती रही। सभी परिवारजन अत्यंत दुखी थे कि उनका बेटा जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है और बहू इतनी लापरवाह, इतनी नास्तिक है। परिवार जनों की उम्मीद १० तारीख पर टिकी थी। सुबह ७ बजे फोन की घंटी बजी तो सभी की धड़कनें तेज हो गईं। विजय के चाचा ने रोते हुए बताया कि विजय ने जीने की उम्मीद दिखाई है, उसने आंखें खोली हैं, पर अभी किसी को पहचान नहीं रहा। परमात्मा की चमत्कारिक शक्तियों को डॉक्टरों ने शत-शत नमन किया। उन्हें भी ग्रहों की बदलती स्थिति और जन्म पत्रिका पर उनके प्रभाव को मानना पड़ा। फिर भी डॉक्टरों ने कहा कि विजय को पूरी तरह स्वस्थ होने में ८-१० महीने लगेंगे और बहुुत धीरे-धीरे सुधार होगा। उसके शीघ्र ठीक होने की परिवार जनों ने ईश्वर से दुआ मांगी। विजय १० सितंबर के बाद ठीक होने के संकेत देने लगा लेकिन वह ३० सितंबर तक भी वेंटिलेटर  पर ही रहा। डॉक्टरों ने कहा कि एक सप्ताह में वे वेंटिलेटर हटाएंगे, अब तो विजय ने बातचीत करना भी आरंभ कर दिया है।

आइए, इस पूरे घटनाक्रम का ज्योतिषीय विश्लेषण करें।

विजय का जन्म कर्क लग्न और मिथुन राशि में १९ अगस्त १९६८ को प्रातः ५ बजे मोदीनगर में हुआ। लग्नेश चंद्र १२वें घर में मिथुन राशि में है और मंगल लग्न में राहु से दृष्ट है। लग्नस्थ मंगल इंसान को कर्मठ, भावुक व साधनसंपन्न बनाता है। चर लग्न का जातक तेजी से तरक्की करता है। नीच का मंगल लग्न में और नीच का शनि (व) दशम भाव में कालपुरुष की कुंडली के अनुसार अपने पक्के घर में है, जिसके फलस्वरूप विजय को मंगल और शनि के सकारात्मक गुण मिले और वह कुशल प्रबंधक बना।

विजय की कुंडली में द्वितीय भाव में चतुर्ग्रही योग असीम लक्ष्मी योग बनाता है। सभी शुभ ग्रहों गुरु (षष्ठेश और नवमेश), सूर्य (द्वितीयेश), बुध (तृतीयेश और द्वादशेश) और लक्ष्मी कारक शुक्र
(चतुर्थेश और एकादशेश) की द्वितीय भाव में स्थिति लक्ष्मी की कृपा, सम्मानित और प्रतिष्ठित परिवार में जन्म का संकेत देती है तथा अतुल संपत्ति, सम्मान, वाक्‌पटुता और दूसरों को मंत्रमुग्ध करने की कला से संपन्न कराती है। विजय की कुंडली सुदृढ़ धन पक्ष और परिवार जनों का सहयोग तो दर्शाती है, परंतु दाम्पत्य सुख से वंचित रहने का भी योग है। उसकी कुंडली में पंचमेश मंगल और सप्तमेश तथा षष्ठेश शनि दोनों नीच के हैं, जो प्रेम और वैवाहिक जीवन में कलह क्लेश दर्शाते हैं। विजय का प्रेम विवाह एक मेजर की लड़की से हुआ जो अत्यंत ही लालची, नीच प्रवृत्ति वाली, नास्तिक है। उसने उसका जीवन नरक बना दिया। उसने विजय को अपने परिवारजनों से दूर कर दिया और सर्वथा विपरीत आचार विचार  के कारण उसके जीवन में हमेशा तनाव बनाए रखा।

विजय की कुंडली में आयु पक्ष भी कमजोर है। लग्नेश क्षीण चंद्र १२वें भाव में और पाप ग्रह मंगल तथा शनि केंद्र में हैं और लग्न पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है। जैमिनी आयुर्दाय के अनुसार निम्नांकित आयु विश्लेषण भी उसके अल्पायु होने का संकेत दे रहा है।

परंतु अष्टम भाव पर ४ शुभ ग्रहों की दृष्टि आयु प्रदान करने में सक्षम है। नवांश कुंडली में सूर्य के उच्च व शनि के वर्गोत्तमी होने के कारण ज्योतिषी को उसके बचने की प्रबल संभावना नजर आई। अष्टमेश शनि पर गुरु की दृष्टि है। परंतु अष्टमेश नीच शनि (व) की दशा ७ दिसंबर २००३ से आरंभ हुई। गुरु और शनि का गोचर जैसे ही प्रतिकूल हुआ, उसे मौत के द्वार पर ला खड़ा किया।

शनि का गोचर सिंह राशि में मारक भाव (द्वितीय) में तब तक शुभ था जब तक गुरु का गोचर नीच राशि में नहीं हुआ था। शनि ने मारक प्रभाव उस दिन दिया, जिस दिन विजय पर शनि और केतु की अंतर्दशा प्रारंभ हुई। केतु तृतीय भाव में अष्टम भाव से अष्टम है। महादशा भी अष्टमेश ग्रह शनि की थी जो सबसे बड़ा मारक बन गया। जिस दिन गोचर में गुरु ग्रह ने नीच का वक्री होकर लग्न से सप्तम व चंद्र से अष्टम भाव में गोचर किया, उस दिन अर्थात १९ अगस्त की ग्रह गोचर स्थिति ने विजय को मृत्यु के द्वार पर ला खड़ा किया। आने वाला शनि का गोचर भी २० दिसंबर २००९ तक विशेष शुभ नहीं है। १० सितंबर २००९ को शनि के कन्या राशि में लग्न से तृतीय भाव में प्रवेश से जीवनी शक्ति प्राप्त हुई परंतु उसे पूर्णतः स्वस्थ होने के लिए गुरु ग्रह का गोचर भी अनुकूल होना चाहिए जो २० दिसंबर के बाद ही होगा। शनि की ढैया में उसे मन का चैन नहीं मिलेगा।

 लग्न कर्क 

  चर राशि   

 चंद्र मिथुन 

  द्विस्वभाव राशि

 लग्नेश चंद्र 

 द्विस्भाव राशि       

अष्टमेश शनि 

 चर राशि   

 लग्न कर्क 

 चर राशि   

 होरा लग्न मिथुन  

  द्विस्भाव राशि         

शनि के सिंह राशि में गोचर से भी विजय की आयु प्रभावित हो रही थी। लेकिन शनि के कन्या राशि में प्रवेश से उसे राहत मिली।

दशा का भोग्यकाल

मंगल : 01 वर्ष 02 माह 01 दिन

शनि

२१/१०/२००३

२१/१०/२०२२

शनि  

 २४/१०/२००६

बुध 

 ०३/०७/२००९

केतु 

 १२/०८/२०१०

शुक्र 

 १२/१०/२०१३

सूर्य  

  २४/०९/२०१४

चंद्र  

 २४/०४/२०१६

मंगल  

 ०३/०६/२०१७

राहु 

 ०९/०४/२०२०

गुरु 

  २१/१०/२०२२

 
Untitled Document
-
फ्यूचर पॉइंट द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित।