पितृदोष = पितृ+दोष अर्थात हमारे पितरों या पूर्वजों द्वारा किए गए कुछ ऐसे कर्म जो हमारे लिए श्राप बन जाते है। ये दोष हम पर पूर्वजों के ऋण होते है। जिनके फल हमें अपने जीवन में भोगने पड़ते है। पितृऋण का सिद्धान्त है- करे कोई, भरे कोई। पिता के पापों का परिणाम
विस्तृत विवरणआश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या पर्यंत पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण, पंचमहायज्ञ आदि का विधान है। हिंदू धर्म ग्रंथों में श्राद्ध आदि का विवेचन अत्यंत विस्तार के साथ किया गया है। श्राद्ध की मूलभूत विवेचना यह है की प्रेत और पितर के निमित उनकी आत्मा
विस्तृत विवरणवैदिक परंपरानुसार पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक होता है, जब वह अपने माता-पिटा की सेवा करें व् उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु तिथि व् महालय में विधिवत श्राद्ध करें। प्रत्येक मानव पर जन्म से ही तीन ऋण होते है। – देव, ऋषि व् पितृ । श्राद्ध की मूल संकल्पना वैदिक दर्शन के कर्मवाद व
विस्तृत विवरणजन्म एवं मृत्यु दोनों अटल सत्य है। गीता में भी कहा गया है की जन्म लेने वालों की मृत्यु एवं मृत्यु को प्राप्त करने वालों का जन्म निश्चित है। - जब तक की उसे मोक्ष की प्राप्ति न हों जाए। इस संसार में ऐसा कोई परिवार नहीं होगा जिसमें किसी की अकाल मृत्यु न हुई हों।
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