जीवात्मा का एक देह से दूसरी देह में जन्म लेना वैसा ही है, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर दूसरे नए वस्त्र धारण करता है। इसी प्रकार जीवात्मा भी नया शरीर धारण करती है। शरीर का नाश होता है। आत्मा का नहीं। पुराणों के अनुसार
विस्तृत विवरणहिंदी गीतों में अक्सर सुना जाता है – सौ बार जन्म लेंगे। ” या “ जन्म जन्म का साथ है ” क्या ये संभव है? क्या बार बार जन्म मिलता है? किसी भी प्राणी की मृत्यु के पश्चात भी क्या कुछ ऐसा है जो शेष रह जाता है? क्या नश्वर शरीर में भी कोई रहता है जो नश्वर नहीं
विस्तृत विवरणकब्रिस्तान से मुर्दों के पुन: उठाने का नाम कयामत है। ईसाई तथा पारसी धर्म के तीन मुख्य सिद्धांत है। म्रृत्यु से पुनरुत्था, ईश्वर से न्याय प्राप्त करना तथा पुरूस्कार अथवा दंड भुगतना। इस प्रकार का पुनरुत्थान केवल आत्मा का ही है। परन्तु इस विषय में सामान्य लोगों का
विस्तृत विवरणजहां पूर्व जन्म और पुनर्जन्म इस जीवन रूपी सरिता के दो तट हैं, वहीँ इन दोनों के बीच की कुछ अवधि प्रत्यक्ष शरीर की रूप-रेखा से दूर रहती है। जीव की यही अवस्था प्रेत योनी कहलाती है। इस योनी के क्या मूलभूत कारण और ज्योतिषीय योग हैं और किस-किस
विस्तृत विवरणपुनर्जन्म की पहली घटना, सबसे पहले मैंने अपने ही गांव महारहा, तहसील – बिन्दकी, जिला – फतेहपुर (उ.प्र.) में सुनी थी। इस घटना का तथ्यपरक, वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक किसी परामनोविज्ञानी द्वारा नहीं हो सका है क्योंकि इस घटना की जानकारी
विस्तृत विवरणप्रत्येक प्राणी, चाहे वह इंसान हो, पशु – पक्षी होई या किट, दो तत्वों से मिलकर बना होता है.- एक तो शरीर जो हमें दिखाई देता है, और दूसरा उसमें आत्मा का वास होता है. आज के युग में मेडिकल विज्ञान ने कितनी ही तरक्की क्यों न कर ली हो परन्तु किसी भी प्राणी या व्यक्ति की मृत्यु आने पर उसको
विस्तृत विवरणइस संसार में प्रत्येक जातक अपने पूर्व जन्मों में किए गए कर्मों के आधार पर ही जीवन पाता है अर्थात जन्म लेता है। पूर्व में किए गए कर्मों (संचित कर्मों) में से कुछ कर्मों कोलेकर ही जातक इस धरती पर प्रकट होता है। जैसे कर्म उसने उस जन्म में किये होते है।
विस्तृत विवरणभारतीय ज्योतिष एवं समाज पूर्ण रूप से पुनर्जन्म के सिद्धांत पर विश्वास करता है। यह माना जाता है की हमारा यह जन्म हमारे पूर्वजन्मों में किये हुए कर्मों के आधार पर ही हमें मिलता है। तथा इस जन्म में किये जाने वाले कर्मों के आधार पर ही हमें अगला जन्म
विस्तृत विवरणमृत्यु उपरांत जीवन की कैसी गति होगी, इसके लिये कुंडली के द्वादश भाव, द्वादशेश तथा इन्हें प्रभावित करने वाले ग्रहों पर विचार करना होगा। द्वादशेश यदि उच्च राशि, स्वराशि, मित्र राशि व् सौम्य ग्रहों के वर्गों में हो तो जीव की सदगति
विस्तृत विवरणयुग – युगान्तरों से सृष्टि का क्रम जारी है। हमारी सृष्टि जब से है तब से पुनर्जन्म की अवधारणा का इतिहास है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में तो ऐसा कहा ही जा सकता है। हिंदू संस्कृति और सभ्यता से जीवंत सामाजिक परिवेश में “पुनर्जन्म” अनेक काव्यों और लोक गाथाओं में वर्णित
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