सामान्य रूप से जितनी भी तांत्रिक क्रियायें और अनुष्ठान किए जाते है, उन्हें किसी विशेष दिन, तिथि तथा योग नक्षत्रों को आधार मानकर किया जाता है। हमारे यहाँ जितने भी त्यौहार या पर्व मनाए जाते है, वे सब प्रकार से सिद्ध योग, नक्षत्रों को मानकर ही निर्धारित किए गए है।
विस्तृत विवरणहमारा जीवन सौभाग्य और दुर्भाग्य की अनुभूतियों से भरा है। कभी हमें सौभाग्य का अनुभव होता है और कभी दुर्भाग्य का। सौभाग्य हमें निश्चित रुप से अच्छा लगता है। परन्तु दुर्भाग्य किसी को अच्छा नहीं लगता है।
विस्तृत विवरणशास्त्र आनंद है वैसे ही विद्याएं भी कई प्रकार की है। बसंत पंचमी के दिन “ ऊँ सरस्वत्यै नम:” के उच्चारण के साथ प्रणाम निवेदन करते हुए सरस्वती जी का आवाहन कर उनका श्रद्धा।
विस्तृत विवरणकिसी भी देवता के नाम अक्षरों के पहले “ ऊं “ और पीछे नम: लगा देने से उस देवता का मंत्र बन जाता है। जैसे - ऊं गणपतये नम:, ऊं नम: शिवाय, ऊं विष्णवे नम: इत्यादि। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में विस्तारपूर्वक बताया है कि मंत्र दिखने में बहुत छोटा
विस्तृत विवरणमहाभारत युद्ध की विभीषिका से क्षुब्ध धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों तथा पत्नी सहित शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह के सन्निकट गए और उनसे अनेक प्रकार की शंकाओं का समाधान करने का आग्रह किया। ज्योंही पितामह ने उपदेश देना प्रारभ किया त्यों ही द्रोपदी
विस्तृत विवरणअवतारों में श्रीराम एवं श्रीकृष्ण का नाम पूरे हिंदू समाज में बड़ी श्रद्धा, भक्ति एवं आस्था के साथ लिया जाता है। दोनों भगवान के अवतार माने जाते है, किन्तु इन दोनों के स्वभाव एवं चरित्र में एक-दूसरे से नितांत भिन्नता दिखलाई देती है इनमें से श्रीराम “मर्यादापुरुषोतम”
विस्तृत विवरणमानव जीवन समस्या एवं संकटों की सत्यकथा है। वस्तुत: इसमें ऐसा कोई क्षण नहीं और ऐसा कोई स्थान नहीं जब मानव किसी न किसी समस्या या संकट से घिरा न हो। हमारे जीवन में दैहिक, दैविक एवं भौतिक दुखों का सिलसिला लगातार चलता रहता है इन सभी प्रकार
विस्तृत विवरणहिंदुओं के सभी कार्यों का श्रीगणेश अर्थात शुभारंभ भगवान गणपति के स्मरण एवं पूजन से किया जाता है। भगवान श्री गणेश की सबसे बड़ी विशेषता यह है की उनके पूजन एवं स्मरण का यह क्रम जीवन भर लगातार चलता रहता है। चाहे कोई व्रत, पर्व, उत्सव, संस्कार, देवपूजन यज्ञ, तप
विस्तृत विवरणमंत्र की जितनी विशद एवं सार्थक व्याख्या भारतीय तत्वज्ञ ऋषियों ने की है। उतनी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती है। हालांकि जैन, बौद्ध, सिख इस्लाम, ईसाई, पारसी एवं यहूदी आदि सभी धर्मों में मंत्र की महता निर्विवाद रूप से विद्यमान और मान्य है
विस्तृत विवरणमंत्रार्थ : मंत्र साधना के रहस्य-वेताओं के अनुसार – “ अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्तिमूलमनौषधम अर्थात कोई ऐसा अक्षर नहीं, जो मंत्र न हो और कोई ऐसी वनस्पति नहीं, जो औषधि न हो। केवल आवश्यकता है अक्षर में निहित अर्थ के मर्म को और वनस्पति में निहित
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